DRDO क्या है? कैसे कोरोना के दौरान ऑक्सीजन की कमी पूरी कर रहा है ये संस्थान
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DRDO की तकनीक से प्रति दिन 195 ऑक्सीजन सिलेंडर भरे जा सकते हैं. इससे 190 कोरोना मरीजों को 5 लीटर ऑक्सीजन प्रति मिनट की दर से ऑक्सीजन की सप्लाई होगी. जानें- डीआरडीओ के बारे में ये बातें.
देश में कोरोना की दूसरी लहर से लोग परेशान हैं. बड़ी संख्या में लोग ऑक्सीजन की किल्लत से जूझ रहे हैं. इस किल्लत से बचने के लिए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने अगले तीन महीने में 500 ऑक्सीजन प्लांट्स बनाने का फैसला किया है. क्या आप जानते हें कि DRDO क्या है और क्यों ये संस्थान ऑक्सीजन प्लांट्स बना रहे हैं. क्या है इनकी जिम्मेदारी... रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के अधीन एक एजेंसी है. सेना के अनुसंधान और विकास का मुख्यालय दिल्ली, भारत में है. इसका गठन 1958 में तकनीकी विकास प्रतिष्ठान के विलय और रक्षा विज्ञान संगठन के साथ भारतीय आयुध कारखानों के तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय द्वारा किया गया था. डीआरडीओ अपनी 52 प्रयोगशालाओं के एक नेटवर्क के साथ विभिन्न क्षेत्रों को कवर करने वाली रक्षा प्रौद्योगिकियों को विकसित करने का काम कर रहा है. डीआरडीओ एयरोनॉटिक्स, आर्मामेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, जीवन विज्ञान, मिसाइल और नौसेना प्रणाली पर काम कर रहा है. डीआरडीओ भारत का सबसे बड़ा और सबसे विविध अनुसंधान संगठन है. संगठन में रक्षा अनुसंधान एवं विकास सेवा (DRDO) से जुड़े लगभग 5,000 वैज्ञानिक और लगभग 25,000 अन्य वैज्ञानिक, तकनीकी और सहायक कर्मी शामिल हैं.More Related News

आज पूरी दुनिया LNG पर निर्भर है. खासकर भारत जैसे देश, जहां घरेलू गैस प्रोडक्शन कम है, वहां LNG आयात बेहद जरूरी है. लेकिन जैसे ही युद्ध या हमला होता है, सप्लाई चेन टूट जाती है और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं. कतर जैसे देशों से निकलकर हजारों किलोमीटर दूर पहुंचने तक यह गैस कई तकनीकी प्रोसेस और जोखिम भरे रास्तों से गुजरती है.












