
कतर से आपकी कार तक! LNG से कैसे बनती है CNG, जानें गैस के प्रोडक्शन और ट्रांसपोर्ट का पूरा खेल
AajTak
आज पूरी दुनिया LNG पर निर्भर है. खासकर भारत जैसे देश, जहां घरेलू गैस प्रोडक्शन कम है, वहां LNG आयात बेहद जरूरी है. लेकिन जैसे ही युद्ध या हमला होता है, सप्लाई चेन टूट जाती है और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं. कतर जैसे देशों से निकलकर हजारों किलोमीटर दूर पहुंचने तक यह गैस कई तकनीकी प्रोसेस और जोखिम भरे रास्तों से गुजरती है.
पश्चिमी एशिया जंग अब और खतरनाक रूप ले चुका है. 28 फरवरी को शुरू हुए इस भीषण संघर्ष ने अब तक भारी तबाही मचाई है. रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी जैसे दुनिया के सबसे बड़े LNG हब पर मिसाइल हमले हुए हैं, और ग्लोबल गैस सप्लाई की सांसें उखड़ रही हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि दुनिया के करीब 20% LNG सप्लाई देने वाला कतर अपना प्रोडक्शन रोकने तक को मजबूर है. हाल ही में कतर के LNG प्लांट पर हुए ड्रोन हमलों ने पूरी दुनिया को एक बार फिर यह समझा दिया है कि गैस सिर्फ एनर्जी नहीं, बल्कि जियो-पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है.
कतर की सरकारी कंपनी ने हमलों के बाद LNG उत्पादन तक रोक दिया, जिससे भारत जैसे देशों की सप्लाई पर सीधा असर पड़ सकता है. आज जब जंग के साए में LNG प्लांट और शिपिंग रूट खतरे में हैं, तब यह समझना और भी जरूरी हो जाता है कि अलग-अलग रूपों में हमारे घर तक पहुंचने वाली LNG कितने कठिन और सेंसिटिव सिस्टम का हिस्सा है. तो आइये जानें LNG क्या है, यह CNG में कैसे बदलती है, और आखिर ये गैस हजारों किलोमीटर दूर देशों तक कैसे पहुंचती है. यही पूरा खेल समझते हैं आसान भाषा में.
लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का इतिहास बहुत ही पुराना है. हालांकि इसक कोई एक अविष्कारक नहीं माना जाता, बल्कि यह तकनीक समय के साथ विकसित हुई. इसकी शुरुआत 19वीं सदी में गैस को ठंडा करके लिक्विड फॉर्म में बदलने के प्रयोगों से हुई, जिसमें ब्रिटिश वैज्ञानिक माइकल फैराडे (Michael Faraday) का बड़ा योगदान माना जाता है.
बाद में 1910–1920 के दशक में गैस को सेफ तरीके से लिक्विफाई और स्टोर करने की टेक्नोलॉजी डेवलप हुई. पहला कमर्शियल एलएनजी प्लांट 1941 में अमेरिका के क्लीवलैंड में बनाया गया, लेकिन 1950–60 के दशक में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ जब समुद्री रास्ते से LNG को एक जगह से दूसरी जगह तक ट्रांसपोर्ट करना संभव हुआ. इस ट्रांसपोर्टेशन की शुरुआत 1964 में हुई, जब अल्जेरिया से यूनाइटेड किंगडम तक पहली बार LNG का कमर्शियल शिपमेंट हुआ, जिसने ग्लोबल गैस बिजनेस की दिशा ही बदल दी.
दरअसल, नेचुरल गैस को जब -162° सेटिग्रेट तक ठंडा किया जाता है तो वह लिक्विड यानी तरल रूप में बदल जाती है, जिसे लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) कहते हैं. इसका वॉल्यूम गैस की तुलना में लगभग 600 गुना कम हो जाता है, जिससे इसे स्टोर और ट्रांसपोर्ट करना आसान हो जाता है. दूसरी तरफ CNG यानी कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) वही गैस है, लेकिन इसे हाई प्रेशर में कंप्रेस करके रखा जाता है, इसमें लिक्विफिकेशन नहीं होता. यह काम बड़े-बड़े गैस प्लांट्स में होता है, जैसे कतर का रास लाफान कॉम्प्लेक्स, जो दुनिया का सबसे बड़ा LNG एक्सपोर्ट टर्मिनल है.
आमतौर पर LNG के कई बाय-प्रोडक्ट हैं, मतलब इस्तेमाल के आधार पर इससे कई गैसें बनाई जाती हैं. मसलन, वाहनों में इस्तेमाल होने वाली CNG, पाइपलाइनों के जरिए रसोई घरों में प्रयोग की जाने वाली PNG इत्यादि. इसके अलावा बड़े पावर प्लांट्स में गैस टर्बाइन चलाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है. कांच, सीमेंट, और स्टील के कारखानों में भट्टियों को गर्म करने के लिए और बड़े क्रूज शिप को चलाने के लिए भी LNG बहुत जरूरी फ्यूल है.













