
5 मौके, जब कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने भी सुप्रीम कोर्ट जजों को कोसने में हद पार कर दी
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माना जाता है कि 1970 के दशक में, इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में न्यायपालिका का सबसे बुरा दौर शुरू हुआ. सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में प्रतिबद्ध न्यायपालिका का दौर यहीं से शुरू हुआ . जिसकी प्रतिक्रिया में बाद में कॉलेजियम सिस्टम ने जन्म लिया.
वक्फ बिल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली बहस को केंद्र में रखते बीजेपी के कुछ सांसदों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा ही नहीं, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी सुप्रीम कोर्ट पर सुपर संसद बनने का आरोप लगाया. इन सब आलोचनाओं को लेकर विपक्ष एनडीए सरकार पर हमलावर है. विपक्ष विशेषकर कांग्रेस का आरोप है कि सरकार संवैधानिक व्यवस्था को खत्म करना चाहती है. पर देश का न्यायिक इतिहास बताता है कि यह कोई नई परंपरा नहीं है. अपने हित में सुप्रीम कोर्ट के फैसले न आने पर पहले भी सरकारों के निशाने पर सुप्रीम कोर्ट रहा है.
1970 के दशक में, इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में न्यायपालिका का सबसे बुरा दौर शुरू होता है. सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में प्रतिबद्ध न्यायपालिका का (committed judiciary) की शुरूआत यहीं से होती है. 1973 में सरकार के खिलाफ फैसला सुनाने के चलते कुछ वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज करके जस्टिस ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया. केशवानंद भारती मामले में जस्टिस जे.एम. शेलट, जस्टिस के.एस. हेगड़े और जस्टिस ए.एन. ग्रोवर ने सरकार के खिलाफ फैसले सुनाए थे, शायद सरकार को उनका यह कदम पसंद नहीं आया . इस कदम को सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देखा गया था.
आपात काल 1975-77 के दौरान, कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट पर नियंत्रण की कोशिश की. जस्टिस एच.आर. खन्ना ने एडीएम जबलपुर मामले में असहमति जताते हुए कहा था कि आपातकाल में भी नागरिकों के मौलिक अधिकार पूरी तरह निलंबित नहीं हो सकते. खन्ना को मुख्य न्यायाधीश बनना था पर उनकी जगह जस्टिस एम.एच. बेग को सीजेआई बनाया गया.इसे सुप्रीम कोर्ट के जजों को सबक सिखाने की कोशिश के रूप में देखा गया. ये तो रही पुरानी बातें पर अभी हाल ही में देखा जाए तो कई मौकों पर कांग्रेस और विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के लिए जजों को कठघरे में खड़ा कर दिया.
1. राफेल सौदा मामला
राफेल लड़ाकू विमान सौदे को प्रभावित करने का आरोप केंद्र सरकार पर लगा था. मामले की सुप्रीम कोर्ट ने जांच की और फैसला सुनाया कि सौदे में किसी भी तरह अनियिमितता नहीं दिख रही है, इसलिए जांच की जरूरत नहीं है. कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. राहुल गांधी ने इस फैसले के बाद भी चौकीदार चोर है जैसे नारे को दोहराया. जिसे अप्रत्यक्ष रूप से कोर्ट के फैसले पर हमला माना गया. राहुल ने कहा कि कोर्ट का फैसला सरकार के प्रभाव में हो सकता है. इस बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और राहुल को अवमानना नोटिस जारी किया. बाद में, राहुल को इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी.
2. जस्टिस दीपक मिश्रा के कई फैसलों पर एतराज

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