
131 साल पहले कन्याकुमारी के इसी रॉक पर जब एक और नरेंद्र ने की थी तपस्या
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कन्याकुमारी में ध्यान कर रहे हैं. ठीक 131 साल पहले उसी जगह एक और नरेंद्र ने ध्यान लगाया था और वहां ध्यान करने के बाद वो शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म संसद में भाषण देने के लिए पहुंचे थे. बाद में आगे चलकर दुनिया ने उन्हें स्वामी विवेकानंद के नाम से जाना. कन्याकुमारी में उनके ध्यान ने हिंदू धर्म की रूपरेखा बदल दी थी.
लोकसभा चुनाव में आखिरी चरण का चुनाव प्रचार थमने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तय कार्यक्रम के मुताबिक कन्याकुमारी पहुंच गए हैं. वे वहां स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल के ध्यान मंडपम् में ध्यान लगा रहे है. पीएम मोदी वहां 45 घंटे तक ध्यान लगाएंगे. 1 जून की शाम वो बाहर आएंगे. इससे पहले गुरुवार को कन्याकुमारी पहुंचने के बाद पीएम मोदी ने सबसे पहले उस मंदिर में पूजा-अर्चना की, जो देवी कन्याकुमारी को समर्पित है और इस मंदिर को भगवती अम्मन मंदिर भी कहा जाता है. आज से ठीक 131 साल पहले जब स्वामी विवेकानंद 1892 में कन्याकुमारी आए थे, तब उन्होंने भी समुद्र की शिला पर ध्यान लगाने से पहले इसी मंदिर में भक्तिपाठ किया था और आज प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपना ध्यान इसी मंदिर में दर्शन के साथ शुरू किया है.
ये ध्यान पीएम ने गुरुवार शाम को 6 बजकर 45 मिनट पर शुरू, जो अब 1 जून की दोपहर 3 बजे तक चलेगा और इस तरह प्रधानमंत्री मोदी पूरे 45 घंटे तक ध्यानमग्न रहेंगे. इस दौरान वो किसी भी तरह का भोजन ग्रहण नहीं करेंगे और सिर्फ नारियल पानी, ग्रेप जूस और पानी ही ग्रहण करेंगे. ध्यान की इस प्रक्रिया में पीएम मोदी 40 घंटे तक मौन धारण करके रखेंगे और ध्यान मंडपम् में जो बड़े से ऊं की आकृति है, वहां उनका ये ध्यान चलेगा. कन्याकुमारी के ध्यान मंडपम् पहुंचने के बाद पीएम मोदी ने स्वामी विवेकानंद के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस और उनकी धर्मपत्नी मां शारदा को नमन किया. उसके बाद स्वामी विवेकानंद की विशाल प्रतिमा पर भी पुष्प अर्पित किए.
पहले भारत भ्रमण किया, फिर कन्याकुमारी पहुंचे स्वामी विवेकानंद
बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि साल 1892 में जब स्वामी विवेकानंद ने कन्याकुमारी की इस शिला पर ध्यान लगाया था, तब इस ध्यान ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत पर केंद्रित किया था. ये वो दौर था, जब स्वामी विवेकानंद जीवन दर्शन में अध्यात्म और हिन्दू धर्म की विशालता को आत्मसात कर रहे थे. उन्होंने तपस्या करने के लिए एक लंबी यात्रा को चुना था, जिसमें वो चार वर्षों तक पूरे भारत का भ्रमण करने वाले थे और इस यात्रा का समापन कन्याकुमारी में होना था.
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स्वामी जी ने तीन दिन और तीन रात तक ध्यान लगाया

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