
10 बार MLA, मुख्यमंत्री को भी दी थी मात... ऐसा रहा कांग्रेस छोड़ BJP में शामिल हुए मोहन राठवा का सफर
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साल 1975 के चुनाव में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को हराकर सूबे की सियासत में खुद को मजबूती से स्थापित करने वाले मोहन सिंह राठवा 10 बार विधायक रहे. मोहन सिंह राठवा ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया है.
गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव कार्यक्रम के ऐलान के बाद अब सूबे में टिकटों को लेकर नेता गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं. इस चुनावी सीजन में नेताओं का एक से दूसरे दल में जाने का सिलसिला भी अब तेज होता दिख रहा है. 27 साल का वनवास समाप्त कर सूबे की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में जुटी कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है.
गुजरात कांग्रेस के कद्दावर नेता और पार्टी के बड़े आदिवासी चेहरे 10 बार के विधायक मोहन सिंह राठवा ने हाथ का साथ छोड़ दिया है. मोहन सिंह राठवा विधानसभा और कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गए हैं. मोहन सिंह राठवा ने 11 बार विधानसभा चुनाव लड़ा और 10 बार विजयी रहे.
मोहन सिंह राठवा साल 1975 में तब अचानक चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को शिकस्त दे दी थी. गुजरात विधानसभा में छोटा उदयपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले मोहन सिंह राठवा की गिनती उन दिग्गजों में होती है जो किसी भी दल से चुनाव मैदान में उतरें, उन्हें हराना आसान नहीं. मोहन सिंह राठवा का पार्टी छोड़ना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
मोहन सिंह राठवा की आदिवासी वोटर्स में अच्छी पैठ मानी जाती है. ऐसे में उनके बीजेपी में शामिल होने से कांग्रेस की मुश्किलें उन सीटों पर और बढ़नी तय मानी जा रही है जहां आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. मोहन सिंह राठवा के मंझले पुत्र राजेंद्र सिंह राठवा लोगों के सुख-दुख में उनके बीच पहुंच रहे हैं और विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं तो वहीं राज्यसभा सांसद नारण राठवा के बेटे और छोटा उदयपुर नगर पालिका के अध्यक्ष संग्राम सिंह राठवा भी कांग्रेस से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं.
कांग्रेस पार्टी के लिए अब छोटा उदयपुर विधानसभा सीट का टिकट सिरदर्द बन गया था. छोटा उदयपुर सीट से पार्टी के दो दिग्गजों के बेटे टिकट के दावेदार थे. कहा ये जा रहा है कि मोहन सिंह राठवा को कांग्रेस से टिकट के लिए अपने बेटे की दावेदारी कमजोर पड़ती दिखी तो उन्होंने पार्टी से ही किनारा करने का फैसला कर लिया और बीजेपी में शामिल हो गए.
सरपंच से शुरू हुआ था सियासी सफर

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