
हर दिशा में बढ़ रहा संघ, रची जा रहीं अनंत कथाएं, निरंतर खड़े हो रहे नए संगठन
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संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर लिखी जा रहीं इन 100 कहानियों की सूची की इस 100वीं कहानी में पिछले तीन चार दशक में शुरू हुए संगठनों, गुमनाम नायकों-प्रचारकों-स्वयंसेवकों की चर्चा की गई है. कोशिश है कि अधिकांश को समेटा जा सके.
रज्जू भैया यूं तो फिजिक्स के प्रोफेसर थे, कभी नोबेल विजेता सीवी रामन ने उन्हें साथ काम करने का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन उनका रचा गया एक संघ गीत ये साबित करता है कि संघ की आत्मा ही नहीं हिंदी साहित्य पर भी उनकी गहरी पकड़ थी. गीत के बोल थे -
“दसों दिशाओं में जायें दल बादल से छा जायें उमड़ घुमड़ कर हर धरती पर नंदनवन सा लहरायें ये मत समझो किसी क्षेत्र को खाली रह जाने देंगे दानवता की बेल विषैली कहीं नहीं छाने देंगे जहां कहीं लू झुलसाती, अमृत रिमझिम बरसायें दसों दिशाओं में जायें दल बादल से छा जायें।“
ये गीत यहां आधा ही लिखा है, लेकिन उनके इस गीत को अधिकांश स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने मन में संकल्प की तरह धारण कर लिया है. परिणाम ये निकलकर आया कि जहां संघ के संस्थापक डॉ केबी हेडगेवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा दूसरा संगठन शुरू करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने के लिए वो भी 11 साल बाद लक्ष्मीबाई केलकर काफी मेहनत करनी पड़ी थी, तब जाकर राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हो पाई थी. वहीं आज देश के हर कौने में, और हर क्षेत्र में किसी ना किसी नए संगठन का संकल्प लिया जा रहा है, नींव रखी जा रही है, या कुछ सालों पहले शुरू होकर वो संघ की मुख्य धारा में आने के लिए कोशिशों में लगा है.
कुछ संगठन तो ऐसे शुरू हुए कि RSS ने उन्हें विभागों के रूप में अपना लिया, जैसे 1989 में सेवा विभाग शुरू किया गया, 1993-94 में सम्पर्क व प्रचार विभाग शुरू हुए. ऐसे सैकड़ों गुमनाम नायक हैं, जो इन संगठनों की जरुरत को समझकर उन्हें इस तरह तराशने में जुटे हैं कि वो ना केवल संघ की बल्कि पूरे समाज की आवश्यकता बन जाएं. संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर लिखी जा रहीं इन 100 कहानियों की सूची की इस 100वीं कहानी में पिछले तीन चार दशक में शुरू हुए ऐसे ही संगठनों, गुमनाम नायकों-प्रचारकों-स्वयंसेवकों की चर्चा की गई है. कोशिश है कि अधिकांश को समेटा जा सके.
विज्ञान भारती भारत एक कल्याणकारी राज्य बनने की राह पर अग्रसर है और इस दौरान उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, इन चुनौतियों की प्रकृति को देखते हुए, भारत की विरासत के अनुरूप विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तीव्र प्रगति ही इन चुनौतियों का समाधान कर सकती है. इस संदर्भ में, स्वदेशी भावना से ओतप्रोत विज्ञान आंदोलन, विज्ञान भारती की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. स्वदेशी विज्ञान आंदोलन की शुरुआत स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से स्थापित हुई देश की नंबर 1 यूनीवर्सिटी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु (IISC) में प्रोफेसर के.आई. बसु के मार्गदर्शन में कुछ प्रख्यात वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी.
यह आंदोलन धीरे-धीरे गति पकड़ता गया और एक राष्ट्रीय स्तर के संगठन के रूप में उभरा. 20-21 अक्टूबर 1991 को नागपुर सम्मेलन में स्वदेशी विज्ञान आंदोलन को अखिल भारतीय स्तर पर शुरू करने का निर्णय लिया गया और इसे विज्ञान भारती नाम दिया गया. विज्ञान भारती की देश भर के 22 राज्यों में इकाइयां हैं और 4 राज्यों में इसके संपर्क सूत्र हैं, यह स्वायत्त संस्थानों, स्वतंत्र संगठनों और परियोजना संस्थाओं के माध्यम से 11 विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है.

आज सबसे पहले हम आपको वो तस्वीर दिखाएंगे. जो मुंद्रा पोर्ट से आई है. यहां स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में गरजती मिसाइल और बरसते ड्रोन्स के बीच से चलकर LPG गैस से भरा शिवालिक जहाज भारत आ गया है. इसमें इतनी गैस है जिससे 32 लाख 40 हजार LPG गैस सिलिंडर भरे जा सकते हैं. लगभग इतनी ही गैस लेकर एक और जहाज. नंदा देवी कल सुबह भारत पहुंच जाएगा. इसके बाद आपको इजरायल-अमेरिका और ईरान के युद्ध के 17वें दिन का हर अपडेट बताएंगे. जंग में पहली बार ईरान ने सेजिल मिसाइल दागी. ये मिसाइल बेहद खतरनाक है, इसके जरिए ईरान अपने देश के किसी भी हिस्से से पूरे इजरायल को निशाना बना सकता है. इस सबके बीच UAE में तेल डिपो में आग लगने के साथ ही दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी हमला हुआ.

दिल्ली एम्स ने 31 वर्षीय हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस के लिए हरीश को शनिवार को गाजियाबाद स्थित आवास से एम्स के डॉ. बीआर अंबेडकर संस्थान रोटरी कैंसर अस्पताल की पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया है, जहां धीरे-धीरे हरीश के लाफ सपोर्ट सिस्टम को वापस लिया जाएगा, ताकि शरीर स्वाभाविक रूप से शांत हो जाए.

महायुद्ध सत्रह दिन से जारी है. मैं श्वेता सिंह इस वक्त इजरायल की राजधानी तेल अवीव में हूं. जहां आज भी ईरान की तरफ से मिसाइल से हमला किया जाता रहा. पश्चिम एशिया में युद्ध कब तक चलेगा इस सवाल पर इजरायल ने बड़ी बात कही है. दावा किया कि उसने कम से कम 3 हफ्ते तक युद्ध जारी रखने की योजना बनाई है. अमेरिका और इज़राइल के बीच ईरान पर युद्ध तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर गया है, जिससे तेल की कीमतों पर असर पड़ रहा है. पिछले 15 दिनों में ईरान पर भारी बमबारी हुई है. लेकिन उसने हथियार नहीं डाले हैं, इसके बाद इजरायल कह रहा है कि उसकी योजना अगले 3 हफ्तों तक युद्द जारी रखने की है.

चंद्रपुर में एक बाघ के सड़क पार करने के दौरान लोगों की लापरवाही सामने आई. राहगीरों ने अपनी गाड़ियां रोककर बाघ को घेर लिया और उसके बेहद करीब जाकर सेल्फी और वीडियो बनाने लगे. यह घटना दुर्गापुर-मोहुर्ली रोड की है, जो ताडोबा टाइगर रिजर्व के पास है. वीडियो वायरल होने के बाद वन विभाग कार्रवाई की तैयारी कर रहा है.

युद्ध के मोर्चे पर ये समझ में नहीं आ रहा है कि इस युद्ध में जीत कौन रहा है. जिस ईरान को समझा जा रहा है कि सुप्रीम लीडर के मारे जाने के बाद वो सरेंडर कर देगा. वो कहीं से भी पीछे हटता नहीं दिख रहा है. बल्कि ईरान तो और ज्यादा अग्रेसिव हो गया है. और इजरायल के अलावा उसने यूएई का बुरा हाल किया हुआ है. दुबई को तो ईरान ने धुआं धुआं कर दिया. दुबई का हाल ये है कि उसकी ग्लोबल कैपिटल वाली इमेज को ईरान के हालिया हमलों से बहुत बड़ा डेंट लगा है.

पश्चिम एशिया में जंग से तेल और गैस की किल्लत की आशंका के बीच भारत के लिए अच्छी खबर है. भारतीय जहाज शिवालिक कतर से लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस लेकर भारत आ गया है, एलपीजी से लदा भारतीय जहाज शिवालिक गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर पहुंचा है. ये जहाज लगभग 46 हजार मीट्रिक टन LPG लेकर आया है, एक घरेलू सिलेंडर में लगभग 14.2 किलोग्राम LPG भरी जाती है. इस तरह से 46 हजार मीट्रिक टन में 32.4 लाख घरेलू सिलेंडर भरे जा सकते हैं. बता दें कि 14 मार्च को ईरान ने शिवालिक को हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत दी थी. वहीं, जहाज नंदा देवी और जग लाडकी कल तक भारत पहुंच सकता है. नंदा देवी जहाज पर भी 46,000 टन LPG लदा है.

युद्ध के बीच भारत का शिवालिक जहाज मुंद्रा पोर्ट पहुंचा है. 45 हजार मीट्रिक टन LPG लेकर शिवालिक पहुंचा है. कल नंदा देवी जहाज भी LPG की सप्लाई लेकर पहुंच रहा है. ईरान से अमेरिका-इजरायल के युद्ध का तीसरा हफ्ता शुरू हो चुका है. ईरान के खिलाफ इस युद्ध में प्रलय की स्थिति तो है लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप कहीं से भी निर्णायक भूमिका में नजर नहीं आ रहे. होर्मुज का समंदर न सिर्फ ट्रंप के लिए सैन्य चुनौती बन गया है, बल्कि कूटनीतिक झटके भी उन्हें मिलते दिख रहे हैं.






