
स्त्री अस्मिता अब केवल विरासत में मिली लड़ाई नहीं, बल्कि वर्तमान में जिया जाने वाला अनुभव है
The Wire
समकालीन स्त्री लेखन स्पष्ट करता है कि स्त्री अस्मिता कोई तैयार परिभाषा नहीं, बल्कि एक सतत निर्माण की प्रक्रिया है. यह संघर्षों से गुज़रती है, सपनों से दिशा पाती है और अपने सरोकारों के माध्यम से समाज में हस्तक्षेप करती है. यह साहित्य किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने का दावा नहीं करता, बल्कि प्रश्नों को खुला छोड़ता है- ताकि संवाद बना रहे.
स्त्री अस्मिता का प्रश्न आज केवल अधिकारों, प्रतिनिधित्व या बराबरी तक सीमित नहीं रह गया है. यह अनुभव, चेतना और आत्मनिर्णय की एक सतत और जटिल प्रक्रिया है. समकालीन साहित्य में स्त्री न तो किसी तय खांचे में फिट बैठती है और न ही किसी एक विमर्श का स्थिर निष्कर्ष बनती है. वह लगातार बनती हुई, बदलती हुई और अपने समय से संवाद करती हुई एक जीवंत उपस्थिति है. साहित्य इस परिवर्तनशील अस्मिता का सबसे संवेदनशील और ईमानदार दस्तावेज़ बनकर सामने आता है.
यदि पूर्ववर्ती स्त्री लेखन में संघर्ष मुख्यतः घरेलू दायरे, विवाह संस्था और सामाजिक निषेधों तक सीमित था, तो आज का संघर्ष कहीं अधिक जटिल और बहुस्तरीय हो गया है. समकालीन स्त्री एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रही है- घर के भीतर अदृश्य श्रम की उपेक्षा से लेकर कार्यस्थलों पर असमान अवसरों तक, सामाजिक नैतिकता की कसौटियों से लेकर डिजिटल निगरानी और सार्वजनिक आलोचना तक.
समकालीन कथा-साहित्य में स्त्री के संघर्ष अक्सर किसी बड़े विस्फोट या टूटन के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरी और लगातार बनी रहने वाली थकान के रूप में सामने आते हैं. यह थकान रोज़मर्रा के छोटे-छोटे समझौतों से जन्म लेती है-जहां स्त्री सब कुछ करती है, पर उसकी उपलब्धियां सहज मान ली जाती हैं. यह संघर्ष चुपचाप सह लेने का नहीं, बल्कि भीतर-ही-भीतर असहमति पालने और अपने लिए जगह बनाने का संघर्ष है.
समकालीन हिंदी साहित्य में युवा स्त्री रचनाकारों की बढ़ती उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि स्त्री अस्मिता अब केवल विरासत में मिली लड़ाई नहीं, बल्कि वर्तमान में जिया जाने वाला अनुभव है. यह पीढ़ी न तो केवल शिकायत करती है और न ही खोखली उम्मीदें जगाती है. वह अपने समय को पूरी ईमानदारी, संकोच और साहस के साथ दर्ज करती है. यही ईमानदारी समकालीन स्त्री लेखन की सबसे बड़ी राजनीतिक और साहित्यिक उपलब्धि है.
आज की स्त्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था से सीधे टकराती कम दिखाई देती है, लेकिन उसके सवाल कहीं अधिक गहरे और असहज होते हैं. क्यों बच्चों से लेकर बड़ों तक की देखभाल का दायित्व स्त्री का माना जाता है? क्यों स्वतंत्रता हमेशा सशर्त होती है? क्यों संतुलन बनाए रखने की ज़िम्मेदारी अंततः उसी पर आ टिकती है? किसने और कब घर की इज़्ज़त को स्त्रियों की साड़ी के आंचल या दुपट्टे के कोर से बांध दिया-जो उनके हंसने, बोलने, खिलखिलाने और स्वतंत्र होकर काम करने से खतरे में पड़ जाती है?
क्यों शादी के बाद घर बदलने की जिम्मेदारी केवल लड़की की होती है? और विवाह में ‘दान’ जैसे शब्द आज भी क्यों जीवित हैं- मानो स्त्री कोई मनुष्य नहीं, कोई वस्तु हो?

महाराष्ट्र में गिरफ़्तार किए गए रेप आरोपी स्वयंभू 'धर्मगुरु' मामले में विपक्ष ने उन नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है, जिनका अशोक खरात से किसी भी प्रकार का संबंध है. विपक्ष का कहना है कि राजनीतिक नेताओं से साठ-गांठ के चलते संभावना है कि राज्य सरकार इस मामले को दबाने की कोशिश करेगी.

योगी आदित्यनाथ की पहचान भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस वजह से विशेष रही कि उन्होंने एक अभियान चलाकर नफ़रती भाषण और नफ़रती अपराधों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया- और इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री ने ख़ुद से ही की. वे देश के सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण करने वाले, लेकिन साथ ही बेहद लोकप्रिय कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नेताओं में से एक हैं.

महाराष्ट्र के एक स्वयंभू ‘धर्मगुरु’ अशोक खरात को पुलिस ने नासिक से गिरफ़्तार किया है. उन पर एक 35 वर्षीय महिला के साथ तीन साल तक बार-बार रेप करने और आपत्तिजनक वीडियो बनाने का आरोप है. हाल ही में राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष द्वारा उनके पैर धोने का वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद उनका विरोध तेज़ हो गया था.

एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट का प्रतिनिधित्व करने वाले फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (एफआईए) ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय से उड़ानों में कम से कम 60% सीटों के चयन के लिए कोई शुल्क न लेने के फैसले को वापस लेने का आग्रह किया है. समूह का कहना है कि इस कदम से एयलाइंस को हवाई किराए बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ेगा.

आरजी कर अस्पताल में बलात्कार और हत्या की शिकार जूनियर डॉक्टर की मां ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार के रूप में पनिहाटी सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने पर सहमति दे दी है. प्रदेश भाजपा की ओर से इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है. हालांकि भाजपा ने उम्मीदवारों की दूसरी सूची जारी की है, जिसमें इस सीट पर कोई प्रत्याशी घोषित नहीं किया गया है.

केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि देशभर में 2017 से अब तक सीवर और सेप्टिक टैंक की ख़तरनाक सफाई के दौरान 622 सफाईकर्मियों की मौत हो चुकी है. 539 परिवारों को पूरा मुआवज़ा दिया गया, जबकि 25 परिवारों को आंशिक मुआवज़ा मिला. मौतों के मामले में उत्तर प्रदेश 86 के साथ सबसे ऊपर है, इसके बाद महाराष्ट्र (82), तमिलनाडु (77), हरियाणा (76), गुजरात (73) और दिल्ली (62) का स्थान है.

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कोटद्वार के ‘मोहम्मद’ दीपक की याचिका पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा कि एक 'संदिग्ध आरोपी' होने के नाते वह अपनी मनचाही राहत, जैसे सुरक्षा और पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ विभागीय जांच की मांग नहीं कर सकते. दीपक ने बीते महीने कोटद्वार में एक मुस्लिम बुज़ुर्ग के साथ दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा की जा रही बदसलूकी का विरोध किया था.

यह त्रासदी नवंबर 2014 में बिलासपुर ज़िले के नेमिचंद जैन अस्पताल (सकरी), गौरेला, पेंड्रा और मरवाही में आयोजित सरकारी सामूहिक नसबंदी शिविरों के दौरान हुई थी. ज़िला अदालत ने आरोपी सर्जन को ग़ैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया और दो साल की क़ैद, 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया. साथ ही पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया.

वी-डेम की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक दुनिया में 92 तानाशाही वाले देश और 87 लोकतांत्रिक देश मौजूद थे. भारत अभी भी 'चुनावी तानाशाह' बना हुआ है, इस श्रेणी में वह 2017 में शामिल हुआ था. 179 देशों में सें भारत लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स में 105वें स्थान पर है. पिछले वर्ष यह 100वें स्थान पर था.

बीते 3 फरवरी को बजट सत्र के पहले चरण के दौरान लोकसभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद अनुशासनहीन व्यवहार के लिए सात कांग्रेस सांसदों और एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद को निलंबित कर दिया गया था. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सोमवार को सभी दलों के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी, जिसमें इन सदस्यों का निलंबन वापस लेने पर सहमति बनी.



