
स्कूली छात्राओं को फ्री सेनिटरी पैड? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब
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Free Sanitary Pad in Schools: याचिका में कहा गया है कि 11 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की किशोरियां, जो गरीब पृष्ठभूमि से आती हैं, उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि यह उनका अधिकार है. उचित मेन्स्ट्रुअल हाईजीन की सुविधाओं की कमी के कारण लगभग 23 मिलियन लड़कियां सालाना स्कूल छोड़ देती हैं.
Free Sanitary Pads: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सरकारी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने के लिए दिशा-निर्देश मांगने वाली याचिका पर केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) से जवाब मांगा है. मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने सोमवार को कहा कि याचिका ने सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्राओं की स्वच्छता का एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. साथ ही इस मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की सहायता मांगी है.
एडवोकेट वरिंदर कुमार शर्मा के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि 11 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की किशोरियां, जो गरीब पृष्ठभूमि से आती हैं, उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि यह उनका अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद 21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा हर बच्चे का हक है.
याचिका में कहा गया, 'ये किशोरियां मेन्स्ट्रुएशन और मेन्स्ट्रुअल हाईजीन के विषय में शिक्षित नहीं हैं. वंचित आर्थिक स्थिति और निरक्षरता के कारण गलत और अस्वास्थ्यकर प्रथाओं का प्रचलन होता है, जिसके गंभीर स्वास्थ्य परिणाम होते हैं. ऐसे में बच्चियों को स्कूल भी छोड़ना पड़ता है.'
यह याचिका मध्य प्रदेश की डॉक्टर जया ठाकुर ने दायर की है. याचिका में कहा गया है, 'दुनिया भर में, हर 3 में से 1 लड़की को अपर्याप्त स्वच्छता का सामना करना पड़ता है, और कई अन्य को इस अवधि के दौरान सामाजिक और सांस्कृतिक सीमाओं में बांध दिया जाता है.'
याचिका में कहा गया है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं और लड़कियों के लिए स्वच्छता बेहद महत्वपूर्ण है. याचिका में एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है कि उचित मेन्स्ट्रुअल हाईजीन की सुविधाओं की कमी के कारण लगभग 23 मिलियन लड़कियां सालाना स्कूल छोड़ देती हैं. दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने मामले में केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है.

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