
सूप किचन से लेकर झुग्गियां, जब महामंदी ने बदल दिया था अमेरिका का चेहरा, क्यों इसे कमला हैरिस से जोड़ रहे डोनाल्ड ट्रंप?
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अमेरिका में राष्ट्रपति पद की रेस में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी की कमला हैरिस के बीच कड़ी टक्कर मानी जा रही है. मतदान से ऐन पहले दोनों ने वोटरों को अपने पाले में लाने पर पूरा जोर लगा दिया. इसी दौरान ट्रंप ने दावा किया कि हैरिस आईं तो देश में कुछ ही दिनों के भीतर साल 1929 का इकनॉमिक डिप्रेशन लौट आएगा. क्या हुआ था तब, जिसे ट्रंप ने ट्रम्प कार्ड की तरह इस्तेमाल किया?
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को कुछ ही घंटे बाकी हैं. आखिर-आखिर तक डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस दोनों ही रैलियां करते रहे. इस बीच ट्रंप ने एक बड़ा बयान देते हुए आशंका जताई कि हैरिस सत्ता में आईं तो साल 1929 की महामंदी छा जाएगी, वहीं अपने ऊपर दांव लगाने पर उन्होंने बेस्ट नौकरियों और देश के सबसे अच्छे आर्थिक दौर का वादा किया. अक्टूबर 1929 में आई मंदी इतनी भयंकर थी कि बहुत से बैंकों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया था. सारी पूंजी गंवा चुके अमीर अपने घर छोड़कर झुग्गियों में रहने लगे थे, जिन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति का मजाक उड़ाते हुए हूवरविले कहा गया.
महामंदी की कहानी के तार जुड़े हुए हैं पहले वर्ल्ड वॉर से. युद्ध खत्म होने के बाद तकलीफों से उबरे लोग जिंदगी को नए सिरे से जीने में जुट गए. वे मन भरकर खरीदारी करते, सैर-सपाटा करते. इसी दौर में लोन का चलन बढ़ा. लोग कर्ज लेकर घर बनाने लगे. बहुत से अमेरिकियों ने लोन लेकर शेयर बाजार में पैसे लगाना शुरू कर दिया. ये खुशहाली का दौर था, लेकिन धुंध में कुछ और ही छिपा हुआ था.
मंगलवार 29 अक्टूबर को शेयर बाजार में भारी गिरावट आई. ये इतनी जबर्दस्त थी कि इस दिन को ही ब्लैक ट्यूसडे कह दिया गया. स्टॉक्स के दाम अचानक गिरने से लाखों लोग अपनी तमाम पूंजी लुटा बैठे. बाजार क्रैश होने के बाद लोग अपने पैसे बैंकों से निकालने लगे, जिससे बैंक बंद होने लगे. ज्यादातर बैंकों के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे सारे बेनिफिशियरीज को उनके पैसे लौटा सकें. लिहाजा बैंकों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया. इससे लोगों की जमा राशि भी चली गई.
इसी समय एक चीज और हुई. आर्थिक खुशहाली को देखते हुए अमेरिका में धड़ाधड़ कारखाने लग गए थे और बहुत सी चीजों का उत्पादन होने लगा था. हालांकि लोगों के पास अब खाने के पैसे नहीं थे, तो वे लग्जरी उत्पाद कहां से खरीदते. सप्लाई और डिमांड की खाई इतनी चौड़ी थी कि कारखाने डूब गए. कुल मिलाकर अमीर-गरीब दोनों ही एक स्तर पर आ चुके थे.
तीन-कोर्स मील लेने वाले देश में तब पहली बार सूप-किचन कंसेप्ट आया. लाखों परिवारों के पास एक वक्त खाने को भी पैसे नहीं थे. तब कई धार्मिक संस्थाओं और कुछ बचे हुए अमीरों ने सूप किचन शुरू करवाया. इसमें लोगों को मुफ्त में सूप, ब्रेड और कभी-कभार कॉफी भी दी जाती थी. लेकिन ज्यादातर चीजें वही थीं जो सस्ती होतीं और जिसमें कम खर्च में ज्यादा लोगों का पेट भर सके. मांस से बनी डिशेज तब काफी कम मिल रही थीं. कई जगहों पर दावा है कि इसी दौरान वहां वेजिटेरियन लोग बढ़े जो मजबूरी खत्म होने के बाद भी शाकाहार पर ही टिके रहे.

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