
सपा की साइकिल पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी हुए सवार, क्या आजम खान जैसे तनकर खड़े हो पाएंगे?
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बसपा प्रमुख मायावती के एक समय राइटहैंड माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस से होते हुए अब सपा में शामिल हो गए हैं. सपा में पहले से ही मुस्लिम नेताओं की पूरी फौज है. ऐसे में नसीमुद्दीन सिद्दीकी क्या आजम खान की तरह तनकर मुस्लिम चेहरे के तौर पर खड़े हो पाएंगे?
उत्तर प्रदेश में होने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच एक दल से दूसरे दल में शामिल होने का सिलसिला शुरू हो गया है. इसी कड़ी में कांग्रेस से अलविदा कहने वाले पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने सिपहसलारों के साथ अखिलेश यादव की मौजूदगी में समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ प्रतापगढ़ के पूर्व विधायक राजकुमार पाल, देवरिया के पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा, पूर्व मंत्री अनीस अहमद फूल बाबू और एआईएमआईएम नेता दानिश खान करीब सैकड़ों नेताओं और उनके समर्थकों ने रविवार को सपा की सदस्यता ग्रहण की.
बसपा से अपनी सियासी पारी को शुरू करने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी एक समय मायावती के राइटहैंड माने जाते थे. बसपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरा हुआ करते थे, लेकिन सपा में पहले से ही पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक एक से बढ़कर एक कद्दावर मुस्लिम नेता है. ऐसे में सवाल उठता है कि सपा की साइकल पर सवार हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी कैसे अपनी सियासी जगह बना पाएंगे?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी साइकिल पर सवार नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी राजनीतिक पारी का आगाज कांशीराम के साथ बसपा से किया था. वहां वे मायावती के सबसे भरोसेमंद मुस्लिम चेहरा माने जाते थे. मायावती की सरकार में नसीमुद्दीन के पास एक दर्जन मंत्रालय का जिम्मा हुआ करता था. बसपा में मुस्लिम राजनीतिक की दशा और दिशा उनके हिसाब से तय हुआ करती थी, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद मायावती के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए और उन्होंने बसपा छोड़ दी. बसपा छोड़ने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए और पश्चिम यूपी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. पिछले महीने कांग्रेस का साथ भी छोड़ दिया.
साढ़े तीन दशक तक बसपा और करीब 8 साल तक कांग्रेस में रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा की साइकिल पर सवार हो गए हैं. उन्होंने सपा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद 2027 में अखिलेश यादव के अगुवाई में सरकार बनाने का दावा किया. नसीमुद्दीन ने कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव कभी भी हिंदू-मुस्लिम की राजनीति नहीं करते, वे हमेशा विकास की राजनीतिक के पक्षधर रहे हैं.
सपा में कैसे बनाएंगे अपनी सियासी जगह बसपा में रहते हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जो सियासी रुतबा हुआ करता था, क्या वैसा राजनीतिक मुकाम सपा में हासिल कर पाएंगे? यह बड़ा सवाल है? हालांकि, नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने फिलहाल अपने समर्थकों को संदेश दिया कि सपा में आने के बाद खुद को जूनियर समझें और खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश न करने को लेकर भी सचेत किया. यह बात कहने की वजह यह भी है कि सपा में पहले से ही मुस्लिम कद्दावर नेताओं की फौज पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक है. यूपी में 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता है, जो सपा के कोर वोटबैंक बने हुए हैं. 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों का करीब 85 फीसदी वोट एकमुश्त सपा को मिला है. सूबे में कांग्रेस-सपा गठबंधन होने के बाद मुसलमानों ने बसपा और AIMIM के मु्स्लिम कैंडिडेट को भी इग्नोर कर दिया था.

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