
सत्ता बदली तो क्या टूट सकता है ईरान? आधे पर्शियन, बाकी अजेरी- बलोच... कुर्द पर शंका
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ईरान में जारी देशव्यापी आंदोलन का रुख वहां सत्ता परिवर्तन की तरफ बढ़ रहा है. सड़कों पर उतरी भीड़ खुलेआम 'डेथ टू डिक्टेटर', 'खामेनेई को मरना होगा', 'पहलवी वापस आएंगे', जैसे नारे लगा रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर वहां खामेनेई की सत्ता खत्म होती है तो क्या होगा. क्या ईरान टूट सकता है. पहले भी एक्सपर्ट ऐसे कयास लगा चुके हैं. ऐसे में समझते हैं आखिर ऐसे अनुमानों के पीछे वजह क्या है.
ईरान में अशांति के बीच अब सवाल उठने लगे हैं कि अगर वहां सत्ता परिवर्तन होता है तो क्या होगा. ऐसा नहीं है कि ऐसे अनुमान पहली बार लगाए जा रहे हैं. पिछले साल इजरायल-ईरान संघर्ष के दौरान भी रेजा पहलवी और दूसरे निर्वासित लोकतंत्र समर्थकों के बयान के बाद विशेषज्ञों ने सत्ता परिवर्तन की स्थिति में ईरान के टूटने की बात कही थी. ऐसे में समझते हैं कि आखिर बार-बार क्यों ऐसी कयास लगाए जाते हैं.
जब कभी खामेनेई के खात्मे की बात होती है, तब तब ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक के विरोधी खेमों से ऐसे दावे शुरू हो जाते हैं कि खामेनेई के जाने पर ईरान टुकड़ों में बंट सकता है. ईरान में मौजूदा समय में जो हालात बने हैं, उसने कई सवालों को जन्म दिया है. अगर खामेनेई सत्ता से हटते हैं तो आगे क्या होगा? क्या फिर से रेजा पहलवी की वापसी होगी या फिर कोई दूसरा लोकतांत्रिक समूह दावेदार होगा?
जब-जब ईरान में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट होती है, तो लोग ऐसे भी दावे करने लगते हैं कि खामेनेई के बाद ईरान टूट भी सकता है. पिछले साल भी जब इजरायल ने ईरान पर हमला किया था, उस वक्त एक निर्वासित नेता ईमान फोरोउतान ने आशंका जताई थी कि सत्ता परिवर्तन के बाद ईरान टूट सकता है. क्योंकि उत्तर-पश्चिमी ईरान में रहने वाले कुर्द हालातों का फायदा उठा सकते हैं.
अब एक बार फिर से ईरान में सत्ता परिवर्तन को लेकर लहर उठी है. इस बार वहां की जनता में इस्लामिक शासन के प्रति जबरदस्त नाराजगी है. ऐसे में फिर वही सवाल खड़ा हो गया है कि सत्ता परिवर्तन के बाद क्या होगा. क्या सच में देश टूट सकता है? आखिर ये सवाल कहां से आ खड़ा होता है और क्यों कोई ऐसा बयान देता है कि कुर्द ईरान को तोड़ने का प्रयास करेंगे? इसे समझने के लिए वहां किस जातीय समूह की बहुलता है और देश की आबादी कैसे धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अलग-अलग धड़ों में बंटा है, इसे जानना जरूरी होगा.क्योंकि, बिना ईरान के इथिनिक स्ट्रक्चर को समझे किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना और किसी भी शख्सियत के बयानों के निहितार्थ को समझना मुश्किल है. ऐसे में समझते हैं यहां की आबादी और अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक समुदायों की क्या हालत है.
एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की अनुमानित जनसंख्या 87.6 मिलियन (वर्ष 2023 तक) है. ईरान की सरकार के रिपोर्ट के अनुसार यहां की जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 99.4 फीसद है. इसमें से 90 से 95% शिया और 5 से 10 प्रतिशत सुन्नी हैं.ईरान में रहने वाले सुन्नी में अधिकतर तुर्कमेन, अरब, बलूच और कुर्द शामिल हैं. तुर्कमेन ईरान के उत्तर पूर्व में, अरब दक्षिण-पश्चिम में, बलूच दक्षिण-पूर्व में और कुर्द उत्तर-पश्चिम प्रांतों में रहते हैं. इसके अलावा सुन्नी आबादी में अफगान शरणार्थी और अन्य प्रवासी समूहों का भी एक बड़ा हिस्सा शामिल है. वैसे अफगान शरणार्थी सुन्नी और शिया दोनों में बंटे हैं.
ये तो हो गई शिया और सुन्नी की बात. ईरान के मामले में सिर्फ शिया और सुन्नी के दृष्टिकोण से यहां के डेमोग्राफ को समझना मुश्किल है. यहां के इथनिक ग्रुप्स एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. ईरान में लोग धर्म के अलावा अलग-अलग सांस्कृतिक और भाषाई समूहों में बंटे हुए हैं. ईरान में सबसे बड़े जिस समुदाय का दबदबा है, वो हैं पर्सियन या फारसी.

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