
संघ के 100 साल: हेडगेवार का स्मृति मंदिर, हाकिम भाई का रोल और गुरु गोलवलकर का अंतिम पत्र
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डॉ हेडगेवार का स्मृति मंदिर बनाने की बात आई तो गुरु गोलवलकर ने कहा कि यह एक राष्ट्रीय स्मारक है, हर स्वयंसेवक की भावना इससे जुड़ी हुई है. ऐसे में देश के हर स्वयंसेवक का इसमें योगदान होगा. तय हुआ कि ‘एक स्वयंसेवक- एक रुपया’ का फॉर्मूला चलेगा. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी घटना का वर्णन.
1956 में जब गुरु गोलवलकर का 51वां जन्मदिन पूरे देश भर में मनाया गया तो उन्हीं दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में स्मृति मंदिर के भव्य निर्माण की भी चर्चा चली. स्मृति मंदिर संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार की समाधि पर बना स्मारक है. संघ की केन्द्रीय समिति ने निर्णय लिया कि स्मृति मंदिर के निर्माण के लिए एक विशेष समिति बनाई जाएगी, जिसकी अध्यक्षता खुद सरसंघचालक गुरु गोलवलकर करेंगे. 1957 में इस समिति का पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) किया गया.
संघ के पास जो धनराशि उन दिनों गुरु दक्षिणा से आती थी, वो ज्यादातर साल भर संगठन के संचालन खर्च में चली जाती थी अथवा संगठन विस्तार में. ऐसे में तय हुआ कि गुरु गोलवलकर के जन्मदिन की तरह इस कार्यक्रम के लिए भी स्वयंसेवकों से सहयोग लिया जाएगा. हालांकि जो ढांचा निर्माण बैठकों में तय हुआ, उसमें उतना धन नहीं लगना था कि अकेले विदर्भ या नागपुर क्षेत्र से इकट्ठा नहीं हो पाता लेकिन गुरु गोलवलकर का कहना था, ये एक राष्ट्रीय स्मारक है, हर स्वयंसेवक की भावना इससे जुड़ी हुई है. ऐसे में देश के हर स्वयंसेवक का इसमें योगदान होगा तो ये सम्बंध और भी मजबूत होगा. सो तय हुआ कि ‘एक स्वयंसेवक- एक रुपया’ का फॉर्मूला चलेगा, ना किसी से कम और ना किसी से ज्यादा.
इस अभियान को आप राम मंदिर के लिए चले अभियान का भी अभ्यास मान सकते हैं. जिस तरह से राम मंदिर का एक प्रस्तावित डिजाइन तैयार करके जनता के बीच जाया गया, उसी तरह संघ के हर स्वयंसेवक के पास प्रस्तावित ‘स्मृति मंदिर’ का चित्र पहुंचाया गया. जाहिर है जो लोग संघ से जुड़े हैं, वो ही डॉ हेडगेवार का त्याग समझते हैं और इस चित्र की वजह से वो इस अभियान से और ज्यादा भावों के साथ जुड़ गए. 21 अक्तूबर 1959 को गुरु गोलवलकर ने एक बयान भी जारी किया. उसे भी स्वयंसेवकों तक पहुंचाया गया. 1959 में ही गुरु गोलवलकर ने स्मृति मंदिर की आधारशिला भी रख दी. पांच बातों का निर्देश
दरअसल हेडगेवार स्मारक समिति के पंजीयन से पहले ही गुरु गोलवलकर ने मुंबई के जाने माने आर्किटेक्ट गोविंद वासुदेव दीक्षित को प्रस्तावित स्मृति मंदिर का डिजाइन तैयार करने के लिए कह दिया था. अक्तूबर 1956 में उन्होंने वो तैयार करके मुंबई में गुरु गोलवलकर को सौंप दिया. इससे पहले संघ के अधिकारियों के बीच ही अगस्त में डिजाइन पर चर्चा हुई थी, तब ये काम दीक्षित को दिया गया था. तैयार डिजाइन से पांच बातें स्पष्ट निकलकर आईं. पहली ये कि मूल समाधि स्थल में कोई बदलाव नहीं होगा. दूसरी ये कि समाधि अब एक कमरे के अंदर होगी, यानी उसके चारों तरफ दीवारें खड़ी कर दी जाएंगी औऱ एक दरवाजा लगा दिया जाएगा और उसके ऊपर डॉ हेडगेवार की एक प्रतिमा लगा दी जाएगी. तीसरा निर्णय था कि पूरा निर्माण पत्थरों से ही किया जाएगा. चौथी बात थी कि सौंदर्यीकरण और सजावट पर तार्किक खर्च ही किया जाएगा. पांचवां और सबसे अहम निर्णय ये था कि आर्किटेक्चर भारतीय होगा औऱ स्वदेशी सामग्री ही निर्माण में प्रयुक्त होगी.
गुरु गोलवलकर ने जब दीक्षित की डिजाइन की ड्राइंग में देखा कि मुगल आर्किटेक्चर जैसा लुक आ रहा है तो कुछ बदलाव भी सुझाए थे. दरअसल रेशम बाग के जिस स्थान पर डॉ हेडगेवार की समाधि थी, वहां एक चबूतरा बनाकर उसके ऊपर तुलसी वृंदावन रख दिया गया था. समाधि के आसपास और किसी भी तरह का निर्माण नहीं था. लेकिन जब गांधीजी की हत्या के बाद संघ के खिलाफ लोगों को भड़काया गया तो एक उन्मादी भीड़ ने समाधि को बुरी तरह तोड़ फोड़ दिया. संघ पर प्रतिबंध होने के नाते उस वक्त कुछ भी नहीं किया जा सका. लेकिन डेढ़ साल बाद जब प्रतिबंध हटा तो उस समाधि की मरम्मत करके साधारण सी सजावट के साथ उसको ढकने वाला एक अस्थाई ढांचा बना दिया.
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