
संघ के 100 साल: 'ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे...', देवरस ने एक सवाल से खड़ा कर दिया रामजन्मभूमि आंदोलन
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प्रयागराज में एक मीटिंग हुई. इस मीटिंग में बालासाहब देवरस ने अयोध्या का जिक्र करते हुए कहा कि ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे. देवरस का ये बयान इस बात का संकेत था कि वे क्या चाहते हैं. यही वो सवाल था जिसने वीएचपी की ओर राम मंदिर आंदोलन की नींव रख दी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस थे, उनके बारे में दो बातें बड़ी चर्चा में रही हैं. एक ये कि वे ईश्वर का अस्तित्व मानते थे, व्रत, पूजा, पाठ से उनका कोई विरोध नहीं था, किंतु स्वयं वह संध्या-वंदन, स्तोत्रों का पाठ नित्य नैमित्तिक कर्म आदि में उदासीन थे. एक बार उन्होंने ये तक कहा था, कि ‘मुझे संघ का कम्युनिस्ट कहते हैं’. दूसरी बात ये कि वे पत्र लिखने से दूर भागते थे, उनके अपने हाथ से पत्र लिखने का अभ्यास न रहने के संदर्भ में तत्कालीन कार्यालय प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने एक किस्सा बताया था, “बालासाहब सरकार्यवाह थे, अखिल भारतीय बैठक के पत्र पांडुरंग पंत तैयार करते थे और सरकार्यवाह हस्ताक्षर करते थे. ऐसे ही एक पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए बालासाहब को एक अच्छा सा फाउंटेन पेन दिया गया था. हस्ताक्षर करने के लिए बालासाहब ने पेन खोला तो उसकी स्याही सूख चुकी थी. इसलिए उन्होंने पांडुरंग पंत से पेन मांगा. पंत ने हंसते-हंसते कहा, प्रतिदिन कुछ लिखने पर स्याही सूखेगी नहीं और ऐसा प्रसंग नहीं आएगा. इस पर बालासाहब ने पूछा, हर रोज क्या लिखूं? पंत ने कहा, ‘राम नाम लिखा करिए’, बालासाहब कहने लगे, बाबू ने मुझे संध्या - वंदन करने को कहा, अब तुम राम नाम लिखने को कह रहे हो, वहां बैठे हुए हम सभी लोग ठहाका मारकर हंस पड़े. ऐसे में किसी को क्या पता था कि एक दिन यही बालासाहब देवरस राम मंदिर आंदोलन की नींव भी रखेंगे. वैसे बचपन में शाखा में वो श्रीराम के बेटे कुश के नाम पर बनी इकाई ‘कुश पथक’ का नेतृत्व करते थे. 1964 में गुरु गोलवलकर दे गए थे राम जन्मभूमि मुक्ति का साधन
हालांकि गुरु गोलवलकर ने 1964 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना करके इस दिशा में एक बड़ा कदम उठा दिया था. उस दौर में ही उन्हें महसूस हो गया था कि अब एक ऐसा संगठन चाहिए जो दुनियां भर के सनातन समाज की आवाज बन सके, उनके मुद्दे उठा सके, ऐसे में भारत के सनातनियों के भी कुछ मुद्दे थे, अनसुलझे मुद्दे, जो किसी तारणहार की बाट जोह रहे थे. आमतौर पर खुद आंदोलन से दूर रहकर उत्प्रेरक की भूमिका निभाने वाले संघ ने इमरजेंसी के दौरान खुद सक्रिय भूमिका निभाकर एक नई राह स्वयंसेवकों को दिखा दी थी कि सनातन में आपदधर्म भी कुछ कहता है, संघ के कई अधिकारियों ने अलग-अलग समय पर माना कि संघ ने आपातकाल के उस आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी. सो इस तरह से संघ को उस आंदोलन का अनुभव भी हो चुका था.
1981 में हुए मीनाक्षीपुरम कांड ने बालासाहब देवरस को ये सोचने पर मजबूर कर दिया था कि हिंदू समाज को अब एकजुट करने का समय आ गया है और ये कई स्तर पर होना है. गांव स्तर पर इकाइयां खड़ी करनी होंगी, हर जाति के हिंदू में ये भाव जगाना होगा कि वो किसी दूसरे के साथ जातिगद भेदभाव का व्यवहार ना करे और ऐसे में राम जन्मभूमि का आंदोलन एक ऐसा मुद्दा हो सकता है, जो पूरे हिंदू समाज को एक कर सकता है. क्योंकि राम सबके पूज्य थे. ऐसे में उन्हें लगा कि मार्गदर्शक जैसी भूमिका में चली आ रही विश्व हिंदू परिषद को अब केन्द्रीय भूमिका में आना ही पड़ेगा. अशोक सिंहल अपने उस भाषण से बालासाहब की नजरों में आ गए
बालासाहब ने बंगलौर में देश भर के प्रचारकों का 5 दिन का एक सम्मेलन बुलाया. उस सम्मेलन में अशोक सिंहल ने इतना ओजस्वी भाषण दिया कि बालासाहब को लगा कि उनको आंदोलन का चेहरा मिल गया है. उन्होंने तभी से सोच लिया था कि अशोक सिंहल विश्व हिंदू परिषद की कमान संभालेंगे, बाद में वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंत पिंगले को जिम्मेदारी दी गई कि वो विश्व हिंदू परिषद के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में होंगे और रज्ज् भैया को बाद में इस आंदोलन के लिए सभी संगठनों से तालमेल कर आंदोलन में लगातार ऊर्जा भरने की जिम्मेदारी दी गई थी. अशोक सिंहल के 90वें जन्मदिन पर हुए उत्सव में वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने बंगलौर (अब बेंगलुरु) सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा था कि, “वहां जिस तरह हिंदुत्व की भावी दिशा पर अशोक सिंहल बोले थे, उससे हमने ये अनुमान लगा लिया था उन्हें विश्व हिंदू परिषद में भेजा जाएगा और यही हुआ भी. बालासाहब ने विश्व हिंदू परिषद को ही उन परिस्थितियों में जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त समझा. उनका आकलन बिलकुल सही था. उन्होंने संघ की शक्ति का सहारा विश्व हिंदू परिषद को दिया”. अशोक सिंहल उन दिनों दिल्ली प्रांत के प्रांत प्रचारक थे. कांग्रेस नेता ने उठाया था श्रीराम जन्मभूमि का मुद्दा
राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर विश्व हिंदू परिषद के चर्चित चेहरे चम्पत राय ने ऑर्गनाइजर में एक लेख लिखा था, जिसके अनुसार, “आरएसएस स्वयंसेवकों द्वारा 23 मार्च, 1983 को मुजफ्फरनगर में एक हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया था. मंच पर माननीय रज्जू भैया, कुछ संत और, जहां तक मुझे याद है, स्वर्गीय जगदीश मुनि भी उपस्थित थे. मुजफ्फरनगर के हिंदू भी बड़ी संख्या में वहां जमा हुए थे. गुलजारी लाल नंदा और दाऊदयाल खन्ना भी मंच पर मौजूद थे, लेकिन विश्व हिंदू परिषद का कोई भी कार्यकर्ता वहां नहीं था, यहां तक कि अशोक सिंहल भी नहीं. वहां दाऊदयाल जी ने अयोध्या, मथुरा और काशी के मंदिरों को पुनः प्राप्त करने का विचार रखा था. वहां एकत्रित हुए लोग स्वयंसेवक और हिंदू समाज के सदस्य थे जिन्हें संघ ने संगठित किया गया था. इस विचार ने उत्साह की लहर पैदा कर दी, अशोक जी दाउदयाल जी से मिलने गए और उनसे इस विषय पर उनके विचार जाने. स्वयंसेवकों का इस अभियान को आगे बढ़ाने में यह पहला योगदान था.”
आपको ये भी समझना होगा कि इस बैठक में रज्जू भैया की मौजूदगी बताती है कि आधिकारिक जिम्मेदारी मिलने से पहले ही वे सक्रिय हो चुके थे. वहीं गुलजारी लाल नंदा और दाऊदयाल खन्ना कांग्रेस से जुड़े थे. दाऊदयाल खन्ना को आमतौर पर राम जन्मभूमि मुद्दा उठाने का श्रेय दिया भी जाता रहा है. “ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे”

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