
संघ के 100 साल: जिस प्रेस में छप रहा था पाकिस्तान का ‘डॉन’, उसी में छपा RSS का पहला अखबार
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सन् 1923 के मध्य में, डॉ. हेडगेवार ने डॉ. एन.बी. खरे और नागपुर नेशनल यूनियन (कांग्रेस के तिलक गुट से संबद्ध एक राष्ट्रवादी समूह) के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर ‘स्वातंत्र्य’ नामक एक दैनिक मराठी समाचार पत्र शुरू करने का निर्णय लिया. यह असहयोग आंदोलन (1920-1922) के बाद चरम राष्ट्रवादी भावना के दौर में हुआ, जिसमें डॉ. हेडगेवार ने सक्रिय रूप से भाग लिया था, और राजद्रोह के आरोप में 1921 में जेल भी गए थे.
ये कहानी 1919 में शुरू होती है, तब के मध्य प्रांत की कांग्रेस के तीन दिग्गज एक समाचार पत्र शुरू करना चाहते थे ताकि मुद्दों को पुरजोर तरीके से जनता के बीच ले जाया जा सके. इसलिए अखबार शुरू करने से पहले जनता की राय जानने और उनसे सदस्यता शुल्क (सब्सक्रिप्शन) लेने की योजना बनाई गई.
इसके लिए उन्हीं तीन में से एक डॉ बीएस मुंजे ने डॉ हेडगेवार को अभियान में लगाया. डॉ हेडगेवार उन दिनों युवा थे, तिलकवादी नेता डॉ बीएस मुंजे के प्रंशसक थे, हाल ही में मेडिकल की डिग्री कोलकाता (तब कलकत्ता) से लेकर आए थे, लेकिन क्लीनिक खोलने, हॉस्पिटल में काम करने की बजाय देश सेवा के अभियान में जुट गए थे. इधर क्रांतिकारियों के संगठन अनुशीलन समिति के साथ जुटे हुए थे, उधर मुंजे के साथ कांग्रेस से भी ज़ुड़ गए थे. इस समाचार पत्र का नाम रखा गया था, ‘संकल्प’.
यह हिंदी भाषी क्षेत्रों में कांग्रेस की पहुंच को मजबूत करने के प्रयासों का एक हिस्सा था, क्योंकि उस समय पार्टी के पास कोई समर्पित हिंदी प्रकाशन नहीं था. यह पहल असहयोग आंदोलन की बढ़ती गति और ग्रामीण एवं गैर-अंग्रेजी भाषी दर्शकों तक पहुंचने के लिए स्थानीय मीडिया की आवश्यकता के बीच आई थी. ‘संकल्प’ का उद्देश्य कांग्रेस की विचारधाराओं को बढ़ावा देना, राजनीतिक घटनाक्रमों पर रिपोर्ट करना और उपनिवेशवाद विरोधी प्रतिरोध को प्रेरित करना था.
इसमें स्वदेशी (आत्मनिर्भरता), हिंदू-मुस्लिम एकता (उस समय गांधीजी के दृष्टिकोण के अनुसार) और ब्रिटिश नीतियों की आलोचना जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया था. इस समाचार पत्र का उद्देश्य अल्पकालिक राष्ट्रवादी प्रकाशनों की लगातार विफलताओं का मुकाबला करने के लिए अग्रिम निधि प्राप्त करना था.
डॉ. हेडगेवार को विशेष रूप से मध्य प्रांत के जिलों में अखबार का प्रचार करने और तीन साल के अग्रिम सदस्यता शुल्क एकत्र करने का काम सौंपा गया था. उन्होंने दूरदराज के गांवों और जिलों (जैसे खंडवा, सागर, दमोह, नरखेड़, पाटन, हरदा और ब्रह्मपुर) का दौरा किया, अक्सर घंटों बैलगाड़ी से यात्रा करते हुए जाना होता था. नए उपक्रमों के प्रति जनता के संदेह और कुछ स्थानीय कांग्रेस नेताओं के समर्थन की कमी जैसी चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने सफलतापूर्वक 1,000 से अधिक ग्राहक जुटाए और धनराशि भेजी (उदाहरण के लिए, 2 अप्रैल, 1919 को 500 रुपये और 25 अप्रैल, 1919 को 600 रुपये). उनके प्रयासों ने उम्मीदों से कहीं अधिक सफलता हासिल की, कई क्षेत्रों में लक्ष्य से अधिक धनराशि एकत्र की (उदाहरण के लिए, खंडवा में 40 और दमोह में 30).
प्रचार अभियान ने ‘संकल्प’ को आरंभ में स्थापित करने और उसे कायम रखने में मदद की, हालांकि इसका दीर्घकालिक भाग्य कई राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के समान ही रहा—सेंसरशिप और वित्तीय समस्याओं से जूझना पड़ा. डॉ. हेडगेवार के इस कार्य ने स्थायी मित्रताएं और जमीनी स्तर की राजनीति की गहरी समझ विकसित की, जिसने उनकी बाद की संगठनात्मक रणनीतियों को प्रभावित किया. उनकी इस क्षेत्र पर गहरी पकड़ बन गई थी. तब तक संघ जैसा कोई विचार शायद उनके मन में भी नहीं था.

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