
संघ के 100 साल: 'आदरणीय शास्त्री जी...', 1948 की वो चिट्ठी जो रज्जू भैया ने बापू की हत्या के बाद जेल से लिखी
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रज्जू भैया जो खुद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर का पद छोड़कर संघ के प्रचारक बने थे, ने एक ऐसा लेख लिखा जो इतने तथ्यों व तर्कों के साथ लिखा गया है कि ये एक दस्तावेज बन गया है. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी पत्र की कहानी.
जब भी आप RSS से जुड़ेंगे या उसके बारे में लिखेंगे, पढ़ेंगे, चर्चा करेंगे तो दो बातों से आपको वास्ता जरूर ही पड़ेगा, एक बात संघ के इतिहास का बड़ा अध्याय है और दूसरा संघ की कोर विचारधारा से जुड़ा है. इतिहास से जुड़ा ये पन्ना है गांधीजी की हत्या का, संघ पर हत्या का आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया, तब के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर को समेत तमाम दिग्गज संघ स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया. संघ पर प्रतिबंध का ये पहला मामला था, जो आजाद भारत सरकार ने लगाया था और उस वक्त चूंकि केन्द्र में गृहमंत्री सरदार पटेल थे, सो प्रतिंबध हटने के बावजूद, संघ पर से हत्या के आरोप झूठे साबित होने के बावजूद संघ पर से ये ठप्पा नहीं हटा है कि ये प्रतिबंध सरदार पटेल ने लगाया था. उस वक्त उत्तर प्रदेश में गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे और बाद में संघ के चौथे सरसंघचालक बने प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया उन दिनों नैनी जेल में बंद थे. वहीं से उन्होंने 7 जुलाई 1948 को जो पत्र शास्त्रीजी को लिखा था, वो बाद में काफी अहम बन गया. गांधी हत्या से जुड़े कई सारे तथ्यों पर ये पत्र प्रकाश डालता है.
ये पत्र जितने तथ्य देता है, उन तथ्यों के आधार पर उतने ही तर्क भी देता है कि 'आखिर जब गांधीजी और डॉ आम्बेडकर को शाखाओं में, कार्यक्रमों में आने में दिक्कत नहीं थी, आप सबको क्यों हो गई है? साथ ही इसमें ये भी बताया कि देश पर संकट के समय कोई खड़ा हो ना हो संघ का स्वयंसेवक जरूर खड़ा होगा और आज उन्हीं स्वयंसेवकों के घर जलाए जा रहे हैं, कोई रोकने वाला भी नहीं. ज्यादातर को जेलों में डाल दिया गया है.'
दूसरा मामला संघ और उसके सहयोगी संगठनों की भारत की प्रशंसा, उसको फिर से विश्वगुरू होने के दावों आदि को लेकर बड़ा अहम है. चूंकि विदेशी आक्रांताओं ने हमारे सारे ग्रंथों को जला दिया, जो थोड़े बहुत मिले भी, उन पर संदेह है कि वो एजेंडे की मिलावट के साथ हेराफेरी करने के बाद सहेजे गए हैं औऱ उन ग्रंथों के आधार पर जो इतिहास लिखा गया, वो भारत के आत्मविश्वास को डिगाने वाला है. जिस भारत भूमि के सबसे प्रांचीन ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचाओं को महिला ऋषियों ने रचा हो, वो ये मान ही नहीं सकते थे कि वेदों को सुनने पर महिलाओं के शीशे में कानों में पिघला शीशा डालने का दंड था. जिस देश ने लोकतंत्र और स्वयंवर व स्त्री धन जैसे महिला अधिकारों को जन्म दिया हो, वो महिला विरोधी कैसे हो सकता है? जहां रामायण, महाभारत, गीता जैसे पवित्र गंथ दलितों ने रचे हों, वहां उनको शिक्षा से कैसे रोका जा सकता है?
उसमें भी हर भारतीय को ये आश्चर्य होता है कि सारे आविष्कार पश्चिम में ही हुए तो भारत कैसे विश्व गुरु हुआ? आजादी के बाद की कई पीढ़ियों ने तो मान लिया था कि भारत में कभी कोई वैज्ञानिक प्रेरणा थी ही नहीं बल्कि ये तो सपेरों औऱ गोली-चूरन वाले वैद्यों का देश था. तब रज्जू भैया जो खुद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर का पद छोड़कर संघ के प्रचारक बने थे, ने एक ऐसा लेख लिखा, जो इतने तथ्यों व तर्कों के साथ लिखा गया है कि युवा पीढ़ी को निश्चित ही अपने देश पर गर्व होगा. इस लेख में आप शास्त्रीजी को लिखा गया रज्जू भैया का पत्र पढ़िए, हालांकि हमने पत्र को उसी भाषा में यहां प्रस्तुत नहीं किया, जैसा उन्होंने लिखा था, बल्कि भाषा को सरल करते हुए उस खंडों में बांटकर सरल शब्दों में लिखा है ताकि आपको उस पत्र का एक एक मुद्दा आसानी से समझ आ सके नैनी जेल से 1948 में रज्जू भैया द्वारा शास्त्रीजी को लिखा गया पत्र
आदरणीय शास्त्री जी, मैं कई दिनों से अनेक मुद्दों पर स्पष्टीकरण चाहता था, पर अब तक ऐसा नहीं कर सका. कुछ दिन पहले मैं अपनी बीमारी के कारण पैरोल पर लखनऊ गया था. मुझे आपसे मिलने की तीव्र इच्छा हुई और मैंने प्रयास भी किया. लेकिन आप वहां नहीं थे, और संभव है कि आप मुझसे मिलने के लिए राज़ी न हुए हों, हालांकि मुझे आपसे इसकी अपेक्षा भी नहीं थी. अब माहौल कुछ शांत हो गया है और स्पष्टता आ गई है, इसलिए कई बातों पर शांति से विचार करना संभव है. यही कारण है कि मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूँ. कारण केवल यह नहीं है कि आप गृह मंत्री हैं, बल्कि इसलिए भी है कि मेरे मन में आपके प्रति स्वाभाविक आदर है; दूसरा, आप अपनी संतुलित बुद्धि के लिए प्रसिद्ध हैं. ऐसा ही हो. न केवल आप, बल्कि पूरा समाज अब स्पष्ट रूप से जानता है कि संघ संगठन का राष्ट्रपिता की अमानवीय हत्या से कोई संबंध नहीं था. ‘गांधीजी की आलोचना तो कांग्रेसी भी करते थे’
पहली बात, कोई स्वयंसेवक ऐसे जघन्य, घृणित अपराध को करने की कल्पना भी नहीं कर सकता. दूसरी बात, हिंदू समाज के मुकुट, उस महान आत्मा के बारे में ऐसा विचार सोचना भी असंभव था, जिनकी वजह से दुनिया के सामने हमारी छवि बुलंद हुई. यह बिल्कुल सच है कि लोग बापू की आलोचना करते थे और उनकी नीतियों पर कई बार असंतोष भी जताते थे. लेकिन क्या हम अपने माता-पिता के विचारों से असहमत नहीं होते? क्या हम उनकी आलोचना नहीं करते? लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि माता-पिता के खिलाफ ऐसा कदम उठाया जा सकता है. क्या यह सच नहीं है कि आदरणीय टंडन जी उनकी हिंदुस्तानी नीति से खुश नहीं थे? क्या श्री चंद्रभान गुप्त ने राशन नीति पर उनकी आलोचना नहीं की थी? क्या पंडित जवाहरलाल जी और पटेल जी ने कई बार अपनी असहमति नहीं जताई थी? लेकिन नहीं; सिर्फ हमें ही इस तरह से आंका गया कि यह झूठा प्रचार किया गया कि हम बापू की तस्वीर का भी अपमान करते हैं. इतना ही नहीं, बल्कि हम उस पर जूते रखते हैं. हमने इस तरह के घटिया झूठ की उम्मीद नहीं की थी. मैंने खुद गोविंद सहाय जी से इस झूठे आरोप को साबित करने का अनुरोध किया था - लेकिन कौन सुनता है?

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