
वो 14 सवाल जो राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के पास प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के लिए भेजे हैं?
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राष्ट्रपति की ओर से पूछे गए प्रश्नों में यह शामिल है कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति के क्या-क्या विकल्प हैं, क्या वे मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य हैं, क्या उनके विवेकाधिकार की न्यायिक समीक्षा संभव है, क्या कोर्ट समयसीमा तय कर सकता है, और क्या विधेयक पर निर्णय कानून बनने से पहले चुनौती दिया जा सकता है.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को एक संदर्भ भेजा है, जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों से संबंधित 14 महत्वपूर्ण प्रश्नों पर उसकी राय मांगी गई है. 13 मई, 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को एक दुर्लभ संदर्भ दिया, जिसमें अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों से संबंधित 14 महत्वपूर्ण प्रश्नों पर उसकी राय मांगी गई.
ये सभी प्रश्न, विधेयकों को स्वीकृति देने के अधिकार से संबंधित हैं, जो तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2025) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का अनुसरण करते हैं जहां न्यायालय ने संवैधानिक अधिकारियों के लिए उनके समक्ष प्रस्तुत विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए समयसीमा निर्धारित की थी. सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ विधेयकों पर स्वीकृति देने की शक्ति से संबंधित इन प्रश्नों पर राष्ट्रपति के संदर्भ पर आज अहम फैसला सुनाएगी.
राष्ट्रपति की ओर से उठाए गए 14 प्रश्न इस प्रकार हैं:
1- जब भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के समक्ष कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है तो उसके समक्ष संवैधानिक विकल्प क्या हैं?
2-क्या राज्यपाल भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत अपने समक्ष विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर अपने पास उपलब्ध सभी विकल्पों का प्रयोग करते समय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बाध्य हैं?
3-क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा संवैधानिक विवेक या विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायोचित है?

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