
यूरोप का वो देश, जिसने मुस्लिम रिफ्यूजियों को एंट्री देने से साफ मना कर दिया, आखिर क्यों इतना सख्त है पोलैंड?
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बीते दिनों फ्रांस दंगों की आग में झुलसता रहा. ये हिंसा अल्जीरियाई मूल के एक किशोर की पुलिस की गोली से हुई मौत के बाद भड़की. इस बीच कई यूरोपीय देश चिंता जताने लगे कि जरूरत से ज्यादा शरणार्थियों को रखने के कारण यूरोप का ये हाल है. वहीं पोलैंड एक ऐसा देश है, जो शरणार्थियों, खासकर अफ्रीका और मिडिल ईस्ट से आ रहे मुस्लिम रिफ्यूजियों को एंट्री ही नहीं देता.
साल 2011 में सीरिया में शुरू हुए गृहयुद्ध के बाद लाखों सीरियाई और पड़ोसी मुल्कों से लोग भागकर यूरोप की शरण में आने लगे. तभी यूरोपियन यूनियन ने वादा किया कि वो अपने देशों में लगभग 2 लाख रिफ्यूजियों को रखेगा. ग्रीस, इटली और फ्रांस में उस समय सबसे ज्यादा लोग भरे हुए थे. बाकी देश भी लोगों को स्वीकार करने लगे, सिवाय पोलैंड के. वहां की सरकार को उसकी दक्षिणपंथी सोच के लिए जाना जाता था. उसने बयान दिया कि शरणार्थियों को रखना यानी अपनी ही तबाही के लिए बम फिट कर लेना.
पोलैंड ने सीधा बयान दिया...
यूरोपियन यूनियन के दबाव बनाने पर वहां एक के बाद एक तीन पोल्स कराई गईं, जिससे साबित हो सके कि सरकार ही नहीं, वहां की आबादी भी बाहरी लोगों से डरती है. लगभग तीन चौथाई लोगों ने मुस्लिम और ब्लैक लोगों को अपनाने से मना कर दिया. पोलिश पीपल्स पार्टी के चेयरमैन व्लादिस्लॉ कॉसिनिएक ने कहा- हम अनाथ बच्चों को अपनाएंगे, लेकिन युवाओं को अपने देश के लिए लड़ने दीजिए.
किस हाल में हैं वहां के शरणार्थी मुस्लिम?
फिलहाल पोलैंड की कुल आबादी में 0.13 प्रतिशत ही मुस्लिम हैं. ये पूरे यूरोप में सबसे कम है. यहां पर यहूदी लोग सबसे ज्यादा लगभग 90 प्रतिशत हैं. जो थोड़े-बहुत मुस्लिम शरणार्थी रह रहे हैं, वे भी काफी भेदभाव झेलते हैं. प्यू रिसर्च सेंटर की साल 2016 की रिपोर्ट कहती है कि हर 10 में से 4 पोलिश वयस्क मुसलमानों को अपने देश का हिस्सा नहीं मानता. ऐसे में इस समुदाय के पास न तो ढंग की एजुकेशन है, न ही नौकरी.
पोलैंड में सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, हरेक माइनोरिटी के लिए गुस्सा है. लेकिन ये बात भी है कि मुसलमानों से पोलिश जनता सबसे ज्यादा बिदकती रही. सेंटर फॉर पब्लिक ओपिनियन रिसर्च ने साल 2018 में एक सर्वे कराया, जिसमें 24 अलग-अलग धर्मों के लोगों के बारे में सवाल किया गया कि क्या पोलैंड के लोग उन्हें स्वीकार करेंगे. इसमें लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने माना कि उन्हें मुसलमान रिफ्यूजी बिल्कुल नहीं चाहिए.

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