
यूपी में 'हाथी और हाथ' की यारी में क्यों और कितनी दुश्वारियां?
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Mayawati Rahul Gandhi: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़े थे और दोनों ही दलों को करारी हार का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि यूपी में कांग्रेस ने बसपा के साथ चुनाव लड़ने और मायावती को सीएम चेहरा बनाने की पेशकश की थी, जिस पर मायावती ने भी पलटवार किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि यूपी चुनाव में आखिर बसपा और कांग्रेस ने क्यों गठबंधन नहीं किया.
उत्तर प्रदेश, पंजाब सहित पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में सबसे बुरा सियासी हश्र कांग्रेस और बसपा का हुआ. कांग्रेस न तो पंजाब में सरकार बचा पाई और न ही किसी अन्य राज्य में सत्ता हासिल कर सकी. वहीं, बसपा की सियासी प्रयोगशाला रही यूपी में मायावती को कारारी मात मिली तो पंजाब में अकाली दल के साथ हाथ मिलाने का भी फायदा पार्टी को नहीं हो सका. ऐसे में हार से हताश कांग्रेस और बसपा के बीच जुबानी जंग जारी है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में कहा था कि कांग्रेस ने यूपी चुनाव में मायावती को गठबंधन की पेशकश की थी और उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना चाहते थे, पर उन्होंने बात तक नहीं की. राहुल ने आरोप लगाया कि मायावती को डर था कि केंद्र सरकार उन्हें डराने के लिए सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल करेगी. इसी के चलते मायावती दलितों की लड़ाई नहीं लड़ सकीं और बीजेपी को खुला रास्ता दे दिया. वहीं, बसपा प्रमुख मायावती ने पलटवार करते हुए कहा कि राहुल गांधी को बसपा के बारे में बोलने से पहले 100 बार सोचना चाहिए. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी इस मामले पर पूरी तरह झूठ बोल रहे हैं.
दरअसल, उत्तर प्रदेश चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के मुंह मोड़ लेने के बाद विपक्षी खेमे में कांग्रेस अलग-थलग पड़ गई थी. ऐसे में कांग्रेस के सामने बसपा के सिवाय कोई सियासी विकल्प रह ही नहीं गया था. कांग्रेस ने बसपा के साथ गठबंधन के लिए संदेश भेजा, लेकिन मायावती ने जवाब तक देना जरूरी नहीं समझा. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस के ऑफर के बाद भी बसपा ने क्यों गठबंधन नहीं किया?
बसपा को दलित वोट बैंक खिसकने का डर बसपा का मूल वोटबैंक दलित एक समय कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा है, जो आजादी के बाद से 1990 तक कांग्रेस के साथ रहा. कांग्रेस के विरोध और दलित राजनीतिक चेतना खड़ी करने के लिए कांशीराम ने बसपा का गठन किया और यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाया. यूपी में दलित वोटर्स कांग्रेस से छिटकर बसपा से जुड़ गया था, जिसे दोबारा से वापस लाने के लिए कांग्रेस ने तमाम प्रयास किए. ऐसे में बसपा प्रमुख मायावती को शंका है कि कांग्रेस से हाथ मिलाने पर कहीं दलित वोट वापस न चला जाए. यही वजह रही कि मायावती ने न तो कांग्रेस से 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन किया और न ही 2022 के विधानसभा चुनाव में.
यूपी में 22 फीसदी दलित मतदाता है, जो सूबे की सियासत में किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. मायावती किसी भी सूरत में दलित वोटों से अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहती हैं. इसीलिए उन्होंने हार के लिए मुस्लिमों को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन दलित वोटों के एक बड़े हिस्से के बीजेपी में जाने पर कोई टिप्पणी तक नहीं की. यूपी चुनाव में इस बार बसपा को कुल 12.88 फीसदी वोट और 1 सीट मिली है.
कांग्रेस से किसी तरह से फायदे की उम्मीद नहीं यूपी की सत्ता से कांग्रेस तीन दशक से सत्ता से बाहर है, जिसके चलते पार्टी का सियासी जनाधार इकाई में है. इस बार तो घटकर 2.33 फीसदी पर पहुंच गया है. ऐसे में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने पर बसपा को सियासी फायदे की उम्मीद नहीं दिख रही थी. साल 1996 में मायावती ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया था, जिसमें बसपा को कोई खास फायदा नहीं मिला था जबकि कांग्रेस को लाभ हुआ था. ढाई दशक में कांग्रेस का सियासी जनाधार यूपी में और भी घट गया है, जिसमें सीट से लेकर वोट फीसदी तक कम हुए हैं. कांग्रेस के परंपरागत वोटर मुस्लिम और ब्राह्मण भी अब उसके साथ नहीं है. ऐसे में मायावती को कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर चुनावी मैदान में उतरने का सियासी लाभ मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही थी, जिस तरह से सपा के साथ गठबंधन करने पर आस थी.

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