
यूपी की मीरापुर सीट का गजब संयोग, लोकल नहीं केवल बाहरी उम्मीदवार ही जीते यहां से
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मीरापुर विधानसभा सीट के चुनावी ट्रेंड की बात करें तो यहां से पिछले 59 साल में कोई भी लोकल नेता विधानसभा नहीं पहुंच सका है. इस विधानसभा क्षेत्र के मतदाता बाहरी उम्मीदवारों पर भरोसा जताते आए हैं.
उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव हो रहे हैं. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा), दोनों ही दलों के लिए नाक का सवाल बन चुके इन उपचुनावों में एक सीट ऐसी भी है जहां के मतदाता लोकल चेहरे की बजाय बाहरी उम्मीदवार पर भरोसा करते आए हैं. यह सीट है मुजफ्फरनगर जिले की मीरापुर विधानसभा सीट. मीरापुर विधानसभा सीट से पिछले पांच दशक से कोई लोकल नेता चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंच सका है.
भोकरहेड़ी, मोरना और फिर मीरापुर हुआ नाम
मीरापुर विधानसभा सीट के अतीत की बात करें तो यह सीट पहले सुरक्षित हुआ करती थी और तब इसका नाम था भोकरहेड़ी विधानसभा. बाद में यह सीट सामान्य हो गई और नाम बदलकर मोरना हो गया. 2012 के विधानसभा चुनाव से इस सीट का नाम मीरापुर हो गया. इस विधानसभा सीट का नाम दो बार बदला, सुरक्षित से सामान्य तक का सफर किया और साथ ही साथ चले कई गजब संयोग भी. एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों को इस क्षेत्र की जनता ने विधानसभा भेजने का काम किया.
परिवार की तीन पीढ़ियों ने किया प्रतिनिधित्व
मीरापुर विधानसभा सीट का एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों ने विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया. यूपी के पहले डिप्टी सीएम बाबू नारायण सिंह इस सीट से विधायक रहे थे. बाबू नारायण सिंह के पुत्र और पोते ने भी विधानसभा में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और संयोग देखिए, दोनों ही फिर संसद भी पहुंचे. बाबू नारायण सिंह के बेटे संजय चौहान सपा के टिकट पर साल 1996 मोरना (अब मीरापुर) विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए थे.
साल 2022 के यूपी चुनाव में सपा की अगुवाई वाले गठबंधन से राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के टिकट पर संजय चौहान के पुत्र चंदन चौहान विधायक निर्वाचित हुए. संजय चौहान भी सांसद रहे थे और अब चंदन चौहान के भी संसद सदस्य निर्वाचित होने की वजह से ही यह सीट रिक्त हुई है. दोनों ही पिता-पुत्र बिजनौर सीट से लोकसभा चुनाव जीते.

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