
मणिपुर में सरकार के गठन की चर्चा तेज, KZC ने बुलाई जनसभा
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मणिपुर में नई सरकार बनाने को लेकर जारी बातचीत के बीच कूकी-जो काउंसिल ने 14 जनवरी को विरोध रैली निकालने का फैसला किया है. ये रैली लंबे समय से लंबित राजनीतिक समाधान की मांग को लेकर आयोजित की जा रही है. आदिवासी संगठन अपनी मांगों को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे हैं.
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन के खत्म होने की समयसीमा (13 फरवरी) नजदीक आते ही सरकार गठन को लेकर चर्चा तेज हो गई है. इसी बीच कुकी जो काउंसिल (KZC) ने राज्य के सभी जिलों में 14 जनवरी को शांतिपूर्ण जनसभा (मास रैली) निकालने की अपील की है. बताया जा रहा है कि कुकी समुदाय की इस रैली का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार से लंबे वक्त से लंबित राजनीतिक समाधान की मांग है. KZC ने अपने बयान में कहा है कि पिछले कुछ वर्षों में समुदाय को भयानक कष्ट झेलने पड़े हैं, जिसमें सामूहिक हत्याएं, घरों और पूजा स्थलों का बड़े पैमाने पर विनाश तथा 40,000 से अधिक लोगों का विस्थापन शामिल है. इन परिस्थितियों का हवाला देते हुए परिषद ने अपनी विधानसभा वाली संघ राज्य क्षेत्र (Union Territory with Legislature) की स्थापना मांग दोहराई.
नई सरकार का हिस्सा बनने से इनकार बताया जा रहा है कि इस मास रैली का नेतृत्व चूड़ाचांदपुर में इंडीजीनस ट्राइबल लीडर्स फोरम करेगा. कुकी समुदाय द्वारा मास रैली की अपील ऐसे वक्त में किया गया है, जब मणिपुर में सरकार बनाने के लिए मंगलवार को SOO (Suspension of Operations) ग्रुप्स, अन्य आदिवासी समुदायों और 10 कुकी विधायकों के बीच बैठकें चल रही हैं. हालांकि, 'कमेटी ऑन ट्राइबल यूनिटी' (CoTU) और ITLF जैसे संगठनों ने नई सरकार का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है. ये संगठन अलग प्रशासन की मांग पूरी न होने तक विधायकों पर सरकार में शामिल न होने का दबाव बना रहे हैं.
भविष्य में जल्द होगा फैसला आदिवासी संगठनों का मानना है कि एसओओ के तहत सशस्त्र समूहों का फैसला ही विधायकों के रुख को तय करेगा. ये रैली दिल्ली तक अपनी आवाज पहुंचाने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है, ताकि उनके भविष्य पर जल्द फैसला हो सके. आपको बता दें कि मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू है जो 13 फरवरी को समाप्त हो रहा है. राष्ट्रपति शासन की समय सीमा समाप्त होने से पहले मणिपुर में फिर से सरकार बनाने की संभावनाएं बढ़ रही हैं, ताकि मणिपुर की वर्तमान स्थिति को बनाए रखने के लिए किसी भी संवैधानिक संशोधन से बचा जा सके.

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