
मंदिरों पर ताला, घरों में वीरानगी और इलाके में ‘रहना मना है’...मालपुरा के हिंदुओं की आपबीती
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उतना खून पहली बार देखा. पति के हाथ-पैर कटे हुए. सिर फरसे से दो-फांक. जमीन पर लोथ पड़ी थी. महीनेभर में सब खत्म हो गया. पहले सुहाग छूटा. फिर घर-जमीन. अब मकान पक्का है, लेकिन घाव कच्चा-टहकता. पुराने मोहल्ले की याद आती है. पुराने घर की, जो 'उन लोगों' ने खरीद लिया. जिस रसोई में बिन नहाए पांव नहीं पड़ते थे, वहां लहसुन-मांस पकता होगा.
80 साल की कल्याणी देवी जब बीते पति और छूटे घर की याद में रोती हैं तो नाक में पड़ी बड़ी सी नथ साथ-साथ डोलती है, मानो मिलकर रो रही हो. पति के साथ वाले दिनों की आखिरी याद. कहती हैं- मेरे साथ इसने भी गाढ़ा दुख देखा, जब जले हुए छाजन के नीचे चूल्हे की बजाए आंतें जलती थीं.
धाराप्रवाह मारवाड़ी में बोलतीं कल्याणी मालपुरा के उन चंद चेहरों में हैं, जो चेहरा दिखाने से नहीं डरते. आंखों में आंखें डाल अनझिप ताकते हुए कहती हैं- हम क्या, हमारे देवी-देवताओं को भी मंदिर खाली करना पड़ गया. सुनती हूं, वहां ताला पड़ा है.
मालपुरा! जयपुर से सड़क के रास्ते चलें तो करीब दो घंटे में शहर पहुंच जाएंगे. आधुनिकता की हर छाप से खाली ये जगह ऐसी है मानो अभी-अभी दोपहर की नींद से जागी हो. सुस्त और रुकी हुई. छोटे चौराहों पर ठहर-थमकर चलती गाड़ियां, बित्ता-बित्ता दुकानें और छोटे-मंझोले मकान.
बस, एक बात अलग है. कुछ गलियां, कुछ मोहल्ले हैं, जहां पांत के पांत घर खाली पड़े हुए दिख जाएंगे. कच्चे घर, पक्के, चाव से बनाए घर, खंडहर होते घर, मिट्टी में मिट्टी हो चुके घर.
ये पलायन है. हिंदुओं का पलायन. बर्फ में दबी उस लाश की तरह जिसके नैन-नक्श, हाथ-पांव सलामत दिखेंगे. जिससे कोई खून नहीं रिसता होगा. लेकिन रहेगी जो एक लाश ही.

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