
बारिश का 'कसूर' बताकर छिप सकेगी प्रशासन की लापरवाही? आखिर IGI एयरपोर्ट हादसे की जवाबदेही किसकी
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दिल्ली में शुक्रवार को जो हुआ है, वो किसी एक शहर की, एक आदमी की खबर नहीं है. ये दस्तक हर शहर औऱ हर भारतीय की है. इसे मुआवजा या सिर्फ निंदा नहीं चाहिए. बल्कि घर से निकलकर घर वापस लौटकर जिंदा आने की सुरक्षा वाली गारंटी चाहिए. क्योंकि आम आदमी कहीं सड़क पर होर्डिंग गिरने से नीचे दबकर मर जाता है.
सुबह-सुबह बारिश हुई, मौसम खुशनुमा हुआ और लोगों ने नींद की झपकी थोड़ी ज्यादा देर तक ली कि चलो अब गर्मी से राहत मिली. लेकिन, आम आदमी की किस्मत में ये चैन और आराम जैसे शब्द जैसे लिखे ही नहीं हैं. अभी तक गर्मी से त्रस्त थे और अब जब पहली ही बारिश हुई है तो निजाम के इंतजामी पेंच इतने ढीले निकले कि एयरपोर्ट के बाहर छत का ढांचा गिर गया. सोचिए, ये हाल राजधानी दिल्ली का है, देश की राजधानी के सबसे पॉश, सबसे खास और सबसे अधिक सुरक्षा में रहने वाले इलाके का है कि जरा सी बारिश होती है और छत का ढांचा गिर जाता है और इसमें एक आदमी की मौत भी हो जाती है. बड़ा सवाल, जिम्मेदार कौन?
एयरपोर्ट पर ड्राईवर, ट्रेन में यात्री की मौत दिल्ली के एयरपोर्ट पर एक गरीब कैब ड्राइवर मर जाता है, क्योंकि एयरपोर्ट के बाहर छत का ढांचा उसकी कार पर गिरा. जिम्मेदारी लेने की जगह कहा जाता है कि ये ढांचा अभी नहीं, बल्कि 2009 में बना था. केरल से दिल्ली आ रही ट्रेन में निचली सीट पर बैठे यात्री पर ऊपर की बर्थ गिर गई और यात्री की मृत्यु हो गई. रेलवे कहता है कि गलती उसकी नहीं है.दिसंबर 2022 में ट्रेन ट्रैक पर निर्माण के दौरान एक सरिया सीधे ट्रेन की खिड़की से आकर एक आम आदमी की गर्दन के आर पार हो गया. आम आदमी मर गया, लेकिन रेलवे ने जिम्मेदारी नहीं ली.
आम आदमी की जान लेते हादसे पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में पिछले ही हफ्ते कंचनजंगा एक्सप्रेस को मालगाड़ी ने टक्ककर मार दी. 9 यात्रियों की जान चली गई. गुजरात में पुल गिरता है या फिर गेमिंग जोन की आग में बच्चे और घरवाले जल कर मर जाते हैं. इन सब जगहों पर मौत के बाद आम आदमी के परिजनों को मुआवजा तो मिलता है, लेकिन ये भरोसा नहीं मिलता कि अगली बार जनता सुरक्षित रहेगी?
घर से निकलकर, जिंदा लौट के आने की गारंटी नहीं दिल्ली में शुक्रवार को जो हुआ है, वो किसी एक शहर की, एक आदमी की खबर नहीं है. ये दस्तक हर शहर औऱ हर भारतीय की है. इसे मुआवजा या सिर्फ निंदा नहीं चाहिए. बल्कि घर से निकलकर घर वापस लौटकर जिंदा आने की सुरक्षा वाली गारंटी चाहिए. क्योंकि आम आदमी कहीं सड़क पर होर्डिंग गिरने से नीचे दबकर मर जाता है. कहीं पुल के लटक जाने, टूट जाने से मौत की नदी में समा जाता है.
कहीं ट्रेन की टक्ककर उसकी जान ले लेती है. कहीं सड़क का गड्ढा उसकी मौत की वजह बन जाता है. अबकी बार एयरपोर्ट के बाहर का ढांचा ही पूरा गिर गया है और अब दो तरीके हैं. या तो इसे सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु मानकर भुला दीजिए या फिर एक नागरिक की हत्या के बाद सियासी बचाव की बेशर्म दलील देने वालों के खिलाफ खड़े होइए।

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