
'फैसला तो दूर... हम इस कोर्ट को ही नहीं मानते', सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान को भारत ने फिर लताड़ा
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भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय ने इस मध्यस्थ निकाय को अवैध बताते हुए उसके सभी आदेशों और फैसलों को शून्य करार दिया.
भारत ने जम्मू-कश्मीर की किशनगंगा और रतले हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय (International Court of Arbitration) के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) के स्थगित रहने के दौरान भारत इस संधि के तहत किसी भी दायित्व को निभाने के लिए बाध्य नहीं है.
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, 'यह कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन अवैध रूप से गठित है, जिसका कानून की नजर में कोई अस्तित्व ही नहीं है. यह कोर्ट भारत द्वारा एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपने अधिकारों के तहत की गई कार्रवाइयों की वैधता की जांच करने का अधिकार नहीं रखता.' भारत ने दोहराया कि उसने कभी भी इस तथाकथित 'इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' के अस्तित्व को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है.
इस कोर्ट का गठन ही संधि का गंभीर उल्लंघन
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सिंधु जल संधि के तहत इस निकाय का गठन अपने आप में संधि का गंभीर उल्लंघन है. इसलिए इस मंच के समक्ष की गई कोई भी कार्यवाही और इसके द्वारा दिया गया कोई भी फैसला या आदेश अवैध है और भारत उसे नहीं मानता. नीदरलैंड की प्रशासनिक राजधानी 'द हेग' (The Hague) स्थित इस मध्यस्थता अदालत ने भारत को निर्देश दिया था कि वह 9 फरवरी तक किशनगंगा और रतले हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के ऑपरेशनल लॉगबुक जमा करे या ऐसा न करने का औपचारिक कारण बताए. भारत ने इस आदेश को खारिज कर दिया है.
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