
नॉर्वे पर कानून की आड़ में विदेशी मूल के बच्चे छीनने के लगे आरोप, रानी मुखर्जी की नई फिल्म के साथ फिर गरमाया मुद्दा
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रानी मुखर्जी की फिल्म 'मिसेज चैटर्जी वर्सेस नॉर्वे' आते ही विवादों में घिर चुकी है. वहां के राजदूत हैन्स जैकब ने फिल्म को झूठा बताते हुए ट्वीट किया. मूवी उस घटना पर आधारित है, जिसमें नॉर्वे में रहती भारतीय मां पर हिंसा का आरोप लगाते हुए उसके बच्चे अलग कर दिए गए. नॉर्वे के बारे में माना जाता है कि वहां भारतीय पेरेंट्स पर ज्यादा ही कड़ी नजर रहती है.
पहले फिल्म की कहानी का मोटा हिस्सा जानते चलें. 'मिसेज चैटर्जी वर्सेस नॉर्वे' सच्ची घटना पर आधारित मूवी बताई जा रही है. दरअसल लगभग 12 साल पहले नॉर्वे चाइल्ड वेलफेयर सर्विस ने वहां रह रही भारतीय महिला सागरिका चक्रवर्ती के दो बच्चों को अपने कब्जे में ले लिया था. चाइल्ड एसोसिएशन का कहना था कि महिला अपने बच्चों पर क्रूरता करती है. सागरिका ने इस पर अदालत में अर्जी लगाई, लेकिन मामला खिंचता रहा.
आखिर में भारत सरकार की दखल देने के बाद महिला को उसके बच्चे वापस मिल सके. इस दौरान ये बात बहुत गरमाई थी कि विदेशी धरती पर अक्सर एशियाई मूल के पेरेंट्स के साथ फर्क होता है.
जर्मनी में भी हुई ऐसी ही एक घटना जर्मनी में रह रहे भारतीय कपल से उनका बच्चे को छीनकर फॉस्टर केयर में रख दिया गया. बेबी अरिहा शाह पिछले दो सालों से वहीं हैं. भारतीय पेरेंट्स अपनी बेटी को वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जर्मन सरकार इसके लिए राजी नहीं. उसका मानना है कि बच्ची के साथ यौन दुर्व्यवहार हुआ है. चाइल्ड प्रोटेक्शन को लेकर बहुत सख्त होने का दावा करते दूसरे देश कई बार मामूली मानवीय चूक भी नजरअंदाज नहीं कर पाते और बच्चे का बचपन छिन जाता है. बेहद चाइल्ड-फ्रेंडली देश नॉर्वे पर अक्सर ऐसा आरोप लगा.
क्या है बेबी अरिहा का मामला? बच्ची के पिता जर्मनी में इंजीनियर बतौर काम कर रहे हैं. लगभग 18 महीने पहले अरिहा के कपड़ों में खून लगा मिला. जर्मन प्रशासन ने माता-पिता पर बच्ची के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए उसे कस्टडी में ले लिया. पेरेंट्स गुहार लगाते रहे कि उसे एक छोटे हादसे में चोट लगी, लेकिन बात सुनी नहीं गई. पिछले डेढ़ सालों से अरिहा फॉस्टर होम में है और 6 महीने और बीतते ही वो दोबारा कभी अपने माता-पिता के पास नहीं भेजी जा सकेगी.
वहां नियम है कि 2 साल फॉस्टर के माहौल में बिताने के बाद बच्चे दूसरे माहौल में एडजस्ट नहीं कर पाते. यानी अगर कुछ ही समय में बच्ची वापस नहीं लौटी तो भारतीय कपल को उसकी उम्मीद ही छोड़नी होगी.
अतिरिक्त सख्ती का आरोप लगता रहा नॉर्वे पर अक्सर ही इस क्रूरता के आरोप लगते रहे. वहां की चाइल्ड वेलफेयर एजेंसी को बेर्नवर्नेट कहते हैं, जिसका मतलब ही है बच्चों की सुरक्षा. एजेंसी को पूरे कानूनी हक हैं कि वो संदेह के आधार पर भी फैसला ले सके. जब भी एजेंसी को लगता है कि कोई माता-पिता बच्चे की अनदेखी कर रहे हैं या उसके साथ किसी तरह की हिंसा हो रही है तो वो तुरंत एक्शन में आती है. किसी तरह का सवाल-जवाब या सफाई नहीं मांगी जाती, बल्कि बच्चे को तपाक से उठाकर फॉस्टर केयर या किसी वेलफेयर संस्था में भेज दिया जाता है. एशियाई देशों को छोड़कर यही कायदा ज्यादातर देशों में है, फिर नॉर्वे कटघरे में क्यों?

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