
धर्मांतरण विरोधी कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, शादीशुदा जोड़ों को परेशान करने का आरोप
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जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इसमें कहा गया है कि यूपी समेत पांच राज्यों के धर्मांतरण कानून को असंवैधानिक घोषित किया जाए. इस कानून की आड़ में अंतर-धर्म वाले शादीशुदा जोड़ों को 'परेशान' किया जा रहा है. ये कानून आपराधिक केसों में फंसाने का साधन बन गया है.
सुप्रीम कोर्ट में धर्मांतरण विरोधी कानून का मामला पहुंचा है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद संगठन का कहना है कि इस कानून का दुरपयोग किया जा रहा है. अंतर-धर्म वाले शादीशुदा जोड़ों को 'परेशान' किया जा रहा है, इसलिए इस कानून को असंवैधानिक घोषित किया जाए.
याचिका में यह भी कहा गया है कि JUH ने इस मसले पर पहले से मौजूद याचिकाओं में पक्षकार बनाने की कोशिश की थी, लेकिन उसे पक्षकार बनाने से इनकार कर दिया गया, इसलिए नई रिट याचिका दायर की गई है. याचिका में मांग की गई है कि पांच राज्यों के धर्मांतरण कानून को असंवैधानिक घोषित किया जाए.
इन राज्यों में कानून रद्द करने की मांग
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है. इसमें धर्मांतरण विरोधी कानून को संवैधानिक वैधता की चुनौती दी गई है. उन्होंने उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021, उत्तराखंड धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2018, हिमाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2019, मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्र अधिनियम, 2021 और गुजरात धर्म की स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2021 को रद्द करने की मांग की है.
आपराधिक केसों में फंसाने का साधन बन गया कानून
अधिवक्ता एजाज मकबूल के जरिए दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि कानून अंतर-धार्मिक जोड़ों को 'परेशान' करने और उन्हें आपराधिक केसों में फंसाने का एक साधन बन गया है. याचिका में कहा गया है कि सभी पांच अधिनियमों के प्रावधान एक व्यक्ति को अपने विश्वास का खुलासा करने के लिए मजबूर करते हैं और इस तरह किसी व्यक्ति की निजता पर आक्रमण करते हैं.

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