
धमकियां देना अमेरिका का पुराना धंधा, हरित क्रांति के समय भी की थी मनमानी... भारत नहीं झुका
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भारत ने डोनाल्ड ट्रंप से पहले भी अमेरिका की धमकियों को नजरअंदाज किया है. साल 1965 में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने भारत को गेहूं की आपूर्ति रोकने की धौंस दी थी, तब भी भारत ने इसकी परवाह नहीं की और अमेरिका के ही वैज्ञानिक की मदद से हरित क्रांति करके मुंहतोड़ जवाब दिया था.
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के बाद अब डोनाल्ड ट्रंप ने मैक्सिको के ड्रग कार्टेल्स पर भी जमीनी हमलों की धमकी दी है. इससे पहले वो भारत पर और ज्यादा टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं, लेकिन भारत का इतिहास रहा है कि वह अमेरिकी दादागीरी के सामने कभी झुका नहीं है. अमेरिका की दादागिरी 1965 में भी हुई थी, जब भारत के लोग पेट भरने के लिए अमेरिकी गेहूं के मोहताज थे. बहरहाल, इस समय हम बात कर रहे हैं मैक्सिको के उस गेहूं और अमेरिकन कृषि वैज्ञानिक की, जिसकी बदौलत हमने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन की धमकियों की परवाह नहीं की. हमने अमेरिका की बदतमीजियों का जवाब हरित क्रांति से दिया, जिसकी शुरुआत गेहूं की उन किस्मों के बीजों से हुई थी जिन्हें उसी मैक्सिको से लाया गया था, जिसे अब ट्रंप धमका रहे हैं. मैक्सिकन गेहूं की किस्मों की बदौलत भारत न सिर्फ भुखमरी के संकट से बाहर निकला बल्कि आज बड़ा निर्यातक भी बन गया है.
भारत 1943 में बंगाल का अकाल झेल चुका था. इसके बाद 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध से देश आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था. दो दशक बीतने के बाद 1964-65 के आसपास भी देश में अन्न का संकट बरकरार था. मॉनसून कमजोर हो गया और फिर अकाल की नौबत आने लगी थी. यह वो दौर था जब हम अमेरिका की पीएल-480 समझौते के तहत हासिल निम्न स्तर का लाल गेहूं खाने को मजबूर थे. इसी दौरान 5 अगस्त 1965 को 30 हजार पाकिस्तानी सैनिक एलओसी पार करके कश्मीर में घुस आए. जवाब में 6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई. इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को धमकी दी कि यदि युद्ध नहीं रुका तो वो भारत को गेहूं देना बंद कर देगा. जब शास्त्री जी ने कहा- बंद कर दीजिए.
क्यों था अनाज का संकट? ऐसा नहीं था कि 1964 से पहले भारत में गेहूं की खेती नहीं होती थी. गेहूं की खेती होती थी. लेकिन 1950 में उसका एरिया 97.5 लाख हेक्टेयर तक ही सीमित था. उत्पादन सिर्फ 64.6 लाख मीट्रिक टन था, जो हमारे खाने के लिए नाकाफी था. सच तो यह है कि गेहूं की कई किस्में भारत में मौजूद थीं. लेकिन इन किस्मों के तने काफी लंबे थे. जो रेनफेड यानी इरीगेशन लेस या वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए थीं. ऐसे में हमें गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए बौनी वैराइटी की जरूरत थी. जो सिंचाई और यूरिया को सह सके, गिरे नहीं. इसका मतलब यह है कि भारत पहले से ही खाद्यान्न संकट से बाहर निकलने के प्लान पर काम कर रहा था.
गेहूं की जीन यात्रा बहरहाल, गेहूं का उत्पादन बढ़ाने की यह क्षमता मैक्सिको में डेवलप हुईं लर्मा रोहो (Lerma Rojo) और सोनारा-64 और सोनारा-64-A जैसी किस्मों में मौजूद थी. इनमें बौने जीन के स्रोत के रूप में नोरिन-10 किस्म का गेहूं काम आया. जिसका जर्मप्लाज्म कोरिया से जापान और फिर संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचा. फिर क्रॉप वैराइटी इंप्रूवमेंट प्रोग्राम के तहत नोरिन-10 के जीन को इंटरनेशनल मेज एंड वीट इंप्रूवमेंट सेंटर (CIMMYT), मैक्सिको को दिया गया, जहां से अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक डॉ. नार्मन बोरलॉग की मदद से वह भारत को मिला. तब डॉ. बोरलॉग सिमिट में रिसर्चर थे.
नोरिन-10 का उपयोग यहां नॉर्मन बोरलॉग और उनके सहयोगियों द्वारा स्थानीय किस्मों के साथ बौनी किस्मों का उत्पादन करने के लिए किया गया था. नोरिन-10 का तना केवल 60-100 सेमी तक लंबा होता था. इसके दो जीन, Rht1 और Rht2 के जरिए गेहूं की ऊंचाई कम हो गई. इससे विकसित नई किस्मों को बाद में दुनिया भर में वितरित किया गया. भारत ने इन किस्मों के 18,000 टन बीज का आयात किया. डॉ. बोरलॉग को विश्व में हरित क्रांति का जनक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने इन किस्मों को दुनिया के तमाम मुल्कों को देकर भुखमरी से लाखों लोगों की जान बचाने में मदद की. इसके लिए उन्हें 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला.
मैक्सिकन गेहूं का योगदान भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान दिल्ली, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना और पंत नगर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के कई स्थानों पर मैक्सिको से आए इन बौने गेहूं की किस्मों का ट्रॉयल किया गया. फिर इन तीनों संस्थानों ने 1966 के आसपास इन बौनी किस्मों की मदद से 'कल्याण सोना' नाम से अपनी नई बौनी किस्म विकसित की. दूसरी किस्म थी सोनालिका. यह शॉर्ट ड्यूरेशन की किस्में थीं जिनकी लेट बुवाई भी की जा सकती थी.

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