
'देश में हर साल निकलता है 3.5 मिट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट', भारत और डेनमार्क के बीच हुआ समझौता
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भारत और डेनमार्क ने एक समझौता किया है, जिसकी बैठक दिल्ली में हुई. मीटिंग में इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि प्लास्टिक के इस्तेमाल को इंडस्ट्री में कैसे कम किया जा सकता है. DRIIV की MD और CEO शिप्रा मिश्रा बताती हैं कि हर साल देश में 3.5 मिट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट पैदा होता है, यह प्लास्टिक वेस्ट अलग अलग सेक्टर से निकलता है.
भारत और डेनमार्क ने एक समझौता किया है, जिसकी बैठक दिल्ली में हुई. मीटिंग में इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि प्लास्टिक के इस्तेमाल को इंडस्ट्री में कैसे कम किया जा सकता है. साथ ही जिस प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, इसके साथ ही प्लास्टिक के री-साइकल और रीयूज को लेकर उपायों पर चर्चा की गई.
TERI के पॉल्यूशन कंट्रोल एंड वेस्ट मैनेजमेंट के डायरेक्टर सुनील पांडे ने कहा कि पर्यावरण को सबसे ज़्यादा नुक़सान पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक से होता है, नदियों के रास्ते होते हुए ये प्लास्टिक अब समुद्र तक पहुंच रही है, समुद्र में पहुंचने वाली प्लास्टिक की मात्रा अब इतनी ज़्यादा हो गई है कि आने वाले समय में समुद्र में मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक होगी. सुनील पांडे ने कहा कि इस प्लास्टिक की वैल्यू ज़ीरो होती है, इसलिए कूड़ा बीनने वाले भी इसे नहीं उठाते.
इस प्लास्टिक को रीसाइकल करके लोग फ़र्नीचर बनाने लगे हैं, ऐसे में सरकार को चाहिए कि इन रैग पिकर्स को अपने साथ जोड़ें और उन्हें ये प्लास्टिक देने के एवज़ में कुछ आर्थिक लाभ दें, ताकि ये प्लास्टिक उन सेंटर्स तक पहुंच सके, जहां इनसे दूसरी चीज़ें तैयार की जा रही हैं.
DRIIV की MD और CEO शिप्रा मिश्रा बताती हैं कि हर साल देश में 3.5 मिट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट पैदा होता है, यह प्लास्टिक वेस्ट अलग अलग सेक्टर से निकलता है. हालांकि पहले प्लास्टिक वेस्ट से निपटने के लिए हमारे पास संसाधन और उपाय कम थे, लेकिन अब धीरे धीरे संसाधन और उपाय दोनों पर तेज़ी से काम किया जा रहा है.

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