
दिल्ली NCR में प्रदूषण से हालात गंभीर, तेजी से बढ़े सांस की बीमारियों वाले मरीज
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सांस की बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या में 25 प्रतिशत की बढ़त हुई है. इसका सीधा मतलब है कि ओपीडी में कफ या ब्रानकाइटिस की दिक्कत लेकर आने वाला हर दूसरा- तीसरा मरीज सांस की बीमारी से पीड़ित है. पूरे दो साल बाद बच्चों में अस्थमा की परेशानी एक बार फिर से देखने को मिली है.
देश की राजधानी में बढ़ते प्रदूषण से हालात गंभीर हो गए हैं. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पराली जलाने के कारण वायु प्रदूषण में वृद्धि के बीच, सांस से संबंधी जटिलताओं में तेजी देखी जा रही है. डॉक्टरों का कहना है कि अस्थमा और ब्रोंकाइटिस से पीड़ित बच्चे और बुजुर्ग बड़ी संख्या में अस्पतालों में आ रहे हैं और कुछ मामलों में जटिलताओं के कारण भर्ती भी हो रहे हैं.
'बच्चों में फिर देखा जा रहा अस्थमा'
दिल्ली के एक निजी अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर प्रवीन कुमार ने कहा कि प्रदूषित हवा के चलते सबसे अधिक खतरा बच्चों को है. सांस की बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या में 25 प्रतिशत की बढ़त हुई है. इसका सीधा मतलब है कि ओपीडी में कफ या ब्रानकाइटिस की दिक्कत लेकर आने वाला हर चौथा और पांचवां मरीज सांस की बीमारी से पीड़ित है. पूरे दो साल बाद बच्चों में अस्थमा की परेशानी एक बार फिर से देखने को मिली है. कोविड के कारण पिछले दो वर्षों में लॉकडाउन के दौरान हवा की गुणवत्ता बेहतर हुई थी लेकिन अब हवा में प्रदूषकों से दमा के मरीज परेशान हो रहे हैं . उन्होंने आगे कहा कि सांस की बीमारियों से पीड़ित बच्चों और बुजुर्गों को इस समय घर के भीतर ही रहना चाहिए.
गर्भ में पल रहे मासूमों को भी खतरा
ये प्रदूषण बच्चों ही नहीं बल्कि नवजातों और गर्भ में पल रहे मासूमों के लिए भी खतरनाक है. नोएडा के फेलिक्स हास्पिटल के चेयरमैन डॉ डी के गुप्ता ने बताया कि पंजाब में पराली जलाने के कारण हवा में अत्यधिक जहरीले प्रदूषक कुछ मामलों में गर्भवती महिलाओं के लिए समय से पहले डिलिवरी का कारण बन सकते हैं. यह नवजात बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है क्योंकि लंबे समय तक इस तरह की जहरीली हवा के संपर्क में होने से फेफड़ों के विकास में बाधा हो सकती है.
'एयर प्योरीफायर का प्रयोग करागर'

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