
तालिबानी मंत्री की आतंकी हमले में मौत, अफगानिस्तान में कौन सा गुट मजबूत हो रहा है तालिबान के खिलाफ?
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अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के शरणार्थी मंत्री खलील हक्कानी की एक आत्मघाती हमले में मौत हो गई. साल 2021 में देश पर उसके टेकओवर के बाद ये पहली ऐसी बड़ी घटना है. तो क्या तालिबान के मुकाबले भी कोई ताकतवर चरमपंथी संगठन खड़ा हो चुका है और किस वजह से वो उससे दुश्मनी पाले हुए है?
लगभग चार साल पहले अफगानिस्तानी सरकार को गिराते हुए तालिबान ने देश पर कब्जा कर लिया. तब से वो कोशिश कर रहा है कि इंटरनेशनल स्तर पर उसे सरकार की तरह मंजूरी मिल जाए, हालांकि ये तो हुआ नहीं, बल्कि अपने ही देश में उसकी जमीन कमजोर पड़ रही है. दो दिन पहले राजधानी काबुल में हुए ब्लास्ट में तालिबान सरकार के मंत्री खलील हक्कानी की मौत हो गई. इसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान ने ली है. क्या है ये, और क्यों तालिबान से दुश्मनी पाले हुए है?
क्या है ISIS खुरासान? यह इस्लामिक स्टेट का ही हिस्सा है, जिसे अफगानिस्तान-पाकिस्तान के आतंकवादी चलाते हैं. इसका मुख्यालय अफगानिस्तान के नांगरहार राज्य में है. असल में सीरिया और इराक में तो इस्लामिक स्टेट का गढ़ था ही, लेकिन ये तमाम मुस्लिम बहुल देशों में भी फैल रहा था. साल 2015 में यह अफगानिस्तान आया, जिसे नाम मिला आईएसकेपी.
यह आईएसआईएस की ही एक शाखा ही है, जिसे अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों में कट्टरपंथी इस्लामिक शासन लाने के लिए बनाया गया था. खुरासान शब्द केवल जगह के लिए इस्तेमाल नहीं हुआ, बल्कि इसका ऐतिहासिक मतलब भी है. इस जगह को इस्लाम के प्रति वफादार लोगों के गढ़ की तरह बताया गया. कट्टरपंथी संगठन इसी बात के साथ युवाओं को अपनी तरफ खींचने लगा.
क्यों है यहां पर एक्टिव - अफगानिस्तान की भौगोलिक परिस्थिति छिपने-छिपाने के लिए बिल्कुल सही है. यहां पहाड़ों, खंदकों में छिपना और सीमाएं पार करना आसान है. - इस देश का कमजोर प्रशासन और लगातार होती आ रही उठापटक भी इस्लामिक स्टेट को बढ़ने के लिए मुफीद माहौल देती रही. - ISIS-K अफगानिस्तान में उन कट्टरपंथियों को अपनी तरफ मोड़ रही है, जो तालिबान से उकताए हुए हैं.
तालिबान के साथ दुश्मनी की वजह इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान और तालिबान दोनों ही चरमपंथी सोच वाले हैं लेकिन उनमें कट्टर दुश्मनी रही. इसकी वजह ये है कि तालिबान आईएस के मुकाबले जरा हल्का पड़ जाता है. जैसे उसने केवल अफगानिस्तान के भीतर इस्लामिक कानून लाना चाहा, जबकि आईएसआई सीधे पूरी दुनिया में यही चाहता है. इस्लामिक स्टेट तालिबान को धार्मिक तौर पर कमजोर भी मानता है क्योंकि उसने खुद को सरकार की तरह स्थापित करने के लिए पश्चिमी देशों की मंजूरी चाही. दोनों संगठन अफगानिस्तान में अपना सिक्का जमाने के लिए लड़ते रहे हैं.

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