
ताइवान में ड्रैगन-विरोधी पार्टी की जीत के क्या हैं मायने, क्यों चीन इस छोटे-से देश पर कब्जा चाहता है?
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ताइवान के चुनाव में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) की जीत से झल्लाए हुए बीजिंग ने बयान जारी कर दिया कि दुनिया में एक ही चीन है, और ताइवान उसका हिस्सा है. नई चुनी हुई पार्टी अपने ड्रैगन-विरोध रवैये के लिए जानी जाती है. तो क्या ताइवान चीन से पूरी तरह आजाद हो जाएगा, या फिर चाइना उसपर नए सिरे से शिकंजा कस सकेगा? क्या है दोनों के बीच मसला?
चीन के भारी विरोध के बाद भी ताइवान में वही पार्टी आई, जिसे वो लगातार अलगाववादी बता रहा था. अब लाई चिंग-ते की लीडरशिप में डीपीपी वहां का काम संभालेगी. चुनावी नतीजे सामने आते ही चीन की बौखलाहट साफ दिखने लगी. टॉप चीनी राजनयिक वांग यी ने कहा कि अगर ताइवान पर कोई भी आजादी के बारे में सोचता है तो इसका सीधा मतलब चीन के बंटवारे से है. इसपर उसे कठोर दंड दिया जाएगा. बीजिंग साथ ही ये कहना भी नहीं भूला कि चीन एक है, और ताइवान उसका हिस्सा है.
ताइवान दक्षिणी-पूर्वी चीन से करीब 100 मील दूर बसा द्वीप है. ये खुद को देश मानता है. उसके पास अपनी सरकार, संविधान और फ्लैग है. दूसरी ओर चीन का मानना है कि ताइवान उसका है. दोनों की भाषा और कल्चर काफी हद तक एक से हैं.
क्या ताइवान चीन का ही अंग था
चीन-ताइवान मामला काफी उलझा हुआ है. पहले ज्ञात ताइवानी ऑस्ट्रोनेशियन थे, जिनके बारे में माना जाता है कि वे चीन के दक्षिणी हिस्से से थे. 17वीं सदी में संक्षिप्त डच शासन के बाद इसपर चीन का शासन हो गया. साल 1895 में पहले चीन-जापान युद्ध में हार के बाद बीजिंग की क्विंग डायनेस्टी ने इसे जापान को दे दिया, जिसने करीब 5 दशक तक इसपर राज किया.
जापान से हार के बाद चीन में कई बदलाव हो रहे थे. हार चुके राजवंश को जड़ से उखाड़ फेंका गया. साल 1919 में वहां एक पार्टी बनी, जिसका नाम था कॉमिंगतांग पार्टी. इसका एकमात्र मकसद चीन को वापस जोड़ना था. हालांकि पार्टी के विरोध में कई गुट बनने लगे. और दूसरे विश्व युद्ध के कुछ ही समय बाद कॉमिंगतांग पार्टी को कम्युनिस्ट सरकार ने हरा दिया.

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