
जो कांग्रेस राम मंदिर का ताला खुलवाने का दावा करती है, उसी ने मंदिर उद्घाटन का न्योता क्यों ठुकराया? 5 point में समझें
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कांग्रेस के ज्यातादर सहयोगी दलों ने साफ कर दिया है कि वो राम लला की मूर्ति के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में नहीं जाएंगे. जबकि न्योता मिलने के बाद कांग्रेस नेता यही कहते आ रहे थे कि इंतजार करिए. जल्द बता देंगे. सोनिया गांधी का पॉजिटिव रुख है. अगर वो नहीं जाएंगी तो किसी पार्टी नेता/ प्रतिनिधिमंडल को अयोध्या भेजेंगे.
अयोध्या में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में कांग्रेस नेता शामिल नहीं होंगे. एक दिन पहले पार्टी हाईकमान ने अपना स्टैंड क्लीयर कर दिया है. कांग्रेस ने अपने बयान में यह भी कहा कि हमारे जिन नेताओं को न्योता मिला है, वे नहीं जाएंगे. अन्य कोई नेता भी इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनेगा. इसे कांग्रेस की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. चूंकि न्योता मिलने के 21 दिन बाद पार्टी ने सार्वजनिक रूप से अयोध्या ना जाने का ऐलान किया है. इससे पहले कांग्रेस खुद को राम और राम मंदिर से जोड़ती आ रही है. सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड भी खेलने से नहीं हिचकती है. लेकिन, इस मेगा इवेंट के न्योते को क्यों ठुकराया है, इसके मायने निकाले जा रहे हैं. पांच पॉइंट में जानिए...
बुधवार को कांग्रेस ने एक बयान जारी किया और बताया कि पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और अधीर रंजन को 22 जनवरी को राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता मिला था. चूंकि यह बीजेपी और आरएसएस का इवेंट है और चुनावी लाभ के लिए अधूरे मंदिर का उद्घाटन किया जा रहा है. इसलिए कांग्रेस पार्टी न्योते को सम्मान अस्वीकार करती है. कांग्रेस पार्टी से कोई नेता अयोध्या के कार्यक्रम में नहीं जाएगा. इसके साथ ही कांग्रेस ने अपने आधिकारिक नोट में उस लाइन को भी जोड़ा, जिसे पिछले दिनों अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, सीपीएम नेता वृंदा करात, सीताराम येचुरी के बयानों में सुना गया है.
1. बीजेपी और आरएसएस का इवेंट है...
कांग्रेस ने भी उसी लाइन को दोहराया है और धर्म को एक निजी मसला बताकर किनारा किया है. पढ़िए कांग्रेस ने अपने बयान में क्या कहा...''हमारे देश में लाखों लोग भगवान राम की पूजा करते हैं. धर्म एक निजी मामला है. लेकिन आरएसएस / बीजेपी ने लंबे समय से अयोध्या में मंदिर को राजनीतिक प्रोजेक्ट बनाया है. बीजेपी और आरएसएस के नेताओं द्वारा अधूरे मंदिर का उद्घाटन स्पष्ट रूप से चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है. 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करते हुए और भगवान राम का सम्मान करने वाले लाखों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी ने स्पष्ट रूप से आरएसएस/बीजेपी के कार्यक्रम के निमंत्रण को सम्मानपूर्वक अस्वीकार कर दिया है.''
2. बीजेपी के एजेंडे में ना फंसा जाए...
तीन महीने से भी कम समय में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. बीजेपी ने यह साफ कर दिया है कि वो राम मंदिर के मुद्दे को भुनाएगी और कांग्रेस को घेरने के लिए 'हिंदू विरोधी' के रूप में प्रचारित करने में कसर नहीं छोड़ेगी. ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का निर्णय बीजेपी के एजेंडे में ना फंसने का हो सकता है. कांग्रेस खुद को धर्म निरपेक्ष पार्टी कहती है. उसका अपना बड़ा वोट बैंक है. शीर्ष नेतृत्व के अंदरखाने यह डर है कि अगर वो अयोध्या जाती, तब भी बीजेपी घेरती और मंदिर आने के लिए मजबूर करने का दम भरती. ऐसे में वो बीजेपी के एजेंडे में फंस सकती थी और सफाई भी देनी पड़ती. कांग्रेस का यह कदम राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में 'अयोध्या सिद्धांत' की कमी को उजागर करता है.

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