
जन नायगन से पहले सेंसर बोर्ड में अटकी ये फिल्में, रोंगटे खड़े कर देने वाली थी एक की कहानी
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सुपरस्टार विजय की फिल्म 'जन नायगन' (Jana Nayagan) इस समय सेंसर बोर्ड की अचड़नों में फंसी हुई है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब कोई फिल्म सेंसर में अटकी हो. इससे पहले भी कई फिल्मों को कानूनी लड़ाई लड़ना पड़ी.
इंडियन सिनेमा का इतिहास सिर्फ चमक-धमक और गानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्ट्रगल से भी भरा हुआ है. ताजा मामला तमिल सुपरस्टार विजय की फिल्म 'जन नायगन' (Jana Nayagan) का है, जो इस समय सेंसर बोर्ड की अचड़नों में फंसी हुई है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब कोई फिल्म सेंसर में अटकी हो. इससे पहले भी कई फिल्मों को कानूनी लड़ाई लड़ना पड़ी.
बता दें कि 'आंधी' से लेकर 'ब्लैक फ्राइडे' तक, ऐसी कई फिल्में रही हैं जिन्हें पर्दे तक पहुंचने के लिए लंबी कानूनी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं. आइए जानते हैं इन फिल्मों के पीछे के असली विवाद क्या थे.
आंधी (1975) गुलजार के डायरेक्श में बनी फिल्म 'आंधी' रिलीज होते ही विवादों के घेरे में आ गई थी. उस समय देश में इमरजेंसी का दौर था और फिल्म की मुख्य किरदार 'आरती देवी' का लुक और अंदाज तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से काफी मिलता-जुलता था. फिल्म को रिलीज के कुछ हफ्तों बाद ही बैन कर दिया गया. बाद में सरकार बदलने पर इसे दोबारा रिलीज किया गया, लेकिन तब तक यह फिल्म सेंसरशिप के खिलाफ एक मिसाल बन चुकी थी. इस फिल्म में संजीव कुमार और सुतित्रा सेन लीड रोल में थे.
बैंडिट क्वीन (1994) शेखर कपूर की यह फिल्म चंबल की मशहूर डकैत फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित थी. सेंसर बोर्ड को फिल्म के कुछ रोंगटे खडे़ कर देने वाले सीन्स, विशेष रूप से फूलन देवी के साथ हुए बलात्कार और उनके नग्न अवस्था में गांव घूमने वाले सीन पर कड़ी आपत्ति थी. बोर्ड ने इसे 'अश्लील' करार दिया और रिलीज पर रोक लगा दी. मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा फिर लंबी बहस और कुछ कट के बाद ए-सर्टिफिकेट के साथ इसे रिलीज की अनुमति मिली.
कामसूत्र: ए टेल ऑफ लव (1996) मीरा नायर की फिल्म 'कामसूत्र' को लेकर सेंसर बोर्ड बहुत सख्त था. बोर्ड का मानना था कि फिल्म में कामुकता और शारीरिक संबंधों को बहुत ज्यादा बारीकी से दिखाया गया है, जो भारतीय संस्कृति के खिलाफ है. भारत में इसे लंबे समय तक बैन रखा गया. हालांकि फिल्म को इंटरनेशनल लेवल पर तारीफ मिली और इसकी सिनेमैटोग्राफी को खूब सराहा गया.
फायर (1996) दीपा मेहता की फिल्म 'फायर' ने भारतीय समाज में उस विषय को छुआ जिसे तब तक 'टैबू' माना जाता था— समलैंगिकता. शबाना आजमी और नंदिता दास के बीच दिखाए गए प्रेम संबंधों ने सेंसर बोर्ड और राजनीतिक दलों को हिलाकर रख दिया था. हालांकि सेंसर बोर्ड ने इसे पास कर दिया था, लेकिन सिनेमाघरों में भारी तोड़फोड़ के बाद इसे दोबारा सेंसर बोर्ड के पास समीक्षा के लिए भेजा गया था.

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