
जगदंबिका पाल ने बताया वक्फ बोर्ड में क्यों गलत नहीं गैर-मुस्लिमों की एंट्री, विष्णु जैन बोले- रोक लगे तो...
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वक्फ बोर्ड पर बनी जेपीसी के चेयरमैन जगदम्बिका पाल ने कहा है कि देश की बड़ी अदालतों ने बार बार कहा है कि वक्फ बोर्ड धार्मिक संस्था नहीं है. इसलिए गैर मुस्लिम सदस्यों के शामिल किए जाने से धार्मिक स्वतंत्रता में कोई दखल नहीं होता है. वहीं विष्णु शंकर जैन ने कहा कि वे इस बात का समर्थन करते हैं कि गैर मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड और वक्फ काउंसिल से हटा दिया जाए. लेकिन उन्होंने एक शर्त भी रखा है.
वक्फ बोर्ड में गैर मुसलमानों को शामिल किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रमुखता से छाया रहा. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने गैर-मुस्लिमों को वक्फ प्रशासन में अनुमति देने के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया, जबकि हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती पर ऐसा ही प्रावधान लागू नहीं होता है.
इस मामले में वक्फ पर बनी जेपीसी के चेयरमैन जगदम्बिका पाल ने कहा है कि वक्फ बोर्ड एक विधि निकाय (कानूनी संस्था) है और इसमें गैर मुस्लिमों का रहना जायज है. वही वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा है कि वे इस बात का समर्थन करते हैं कि गैर मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड और वक्फ काउंसिल से हटा दिया जाए. लेकिन इसके लिए उन्होंने एक शर्त रखी.
वहीं बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान जजों ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा है कि, "क्या आप सुझाव दे रहे हैं कि मुसलमान अब हिंदू बंदोबस्ती बोर्ड का हिस्सा भी हो सकते हैं?
अदालत में मुस्लिम पक्षकारों की ओर से अदालत में बहस कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना, विशेष रूप से बड़ी संख्या में, मुस्लिम धर्मार्थ बंदोबस्तों की देखरेख करने वाली संस्था के धार्मिक चरित्र को कमजोर करता है.
कपिल सिब्बल ने कहा, "हिंदू और सिख धार्मिक बोर्डों के विपरीत, जहां केवल संबंधित धर्म के सदस्यों का प्रतिनिधित्व होता है, इस परिषद में सांसद और पेशेवर शामिल हैं, जिनका मुस्लिम होना जरूरी नहीं है." सिब्बल ने कहा कि नए कानून का यह प्रावधान धार्मिक संप्रदायों द्वारा अपने मामलों का प्रबंधन करने की अनुच्छेद 26 में दी गई गारंटी का उल्लंघन करता है.
सुप्रीम कोर्ट में उठे इस मामले पर वक्फ बिल पर बनी संयुक्त संसदीय कमेटी के चेयरमैन जगदम्बिका पाल ने अपनी राय दी है. उन्होंने कहा कि ये सही सवाल है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस सवाल का आज उठा रहा है इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में रामराज फाउंडेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2010) के केस में ये सवाल उठा था.

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