
चैती छठ आज... जानिए कौन हैं छठी मैया, दुर्गा माता के छठवें रूप से क्या है कनेक्शन
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छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, मुख्य रूप से कार्तिक और चैत्र महीने में. यह व्रत सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जो पालन-पोषण और सुरक्षा की देवी मानी जाती हैं.
एक तरफ जहां चैत्र नवरात्र का व्रत जारी है, तो वहीं बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड में छठ पर्व भी मनाया जा रहा है. असल में छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है. मुख्य रूप से छठ पर्व कार्तिक महीने में दिवाली के ठीक बाद मनाया जाता है. जिसे कार्तिक षष्ठी, सूर्य षष्ठी व्रत और आम बोलचाल में कतिकी छट्ठी कहते हैं. इसी तरह चैत्र महीने में चैती छठ मनाया जाता है. इस दौरान चैती छठ ही मनाया जा रहा है. छठ का व्रत भाद्रपद में भी मनाया जाता है जो सिर्फ एक दिन का होता है. इस हरषष्ठी या हलछठ के नाम से जाना जाता है.
खैर, ये तो रही छठ व्रत की परंपरा. अब छठ व्रत के देवता की बात करें तो इसके मुख्य देवता सूर्य देव हैं, लेकिन असल में ये व्रत एक देवी के नाम पर है जिन्हें समाज छठी मैया कहकर पुकारता है. यहीं से यह सवाल भी उठता है कि कौन हैं छठी मैया और सूर्य पूजा का व्रत उनके नाम पर क्यों होता है.
असल में छठी माता कनेक्शन पालन-पोषण से जुड़ा हुआ है. छठी देवी सूर्य की सात किरणों में से भी एक हैं. दूसरी मान्यता ये है कि भगवान विष्णु के माथे में, जहां तिलक लगाया जाता है, उसमें जो योगमाया हैं वही छठी माता हैं. क्योंकि वह भगवान विष्णु की कल्पना शक्ति हैं. पांच ज्ञानेंद्रियों (five senses) के अलावा जिस एक काल्पनिक छठी इंद्रिय (Sixth Sense) की बात कही जाती है, वह भी यही देवी हैं.
यह देवी पोषण की इस जिम्मेदारी को बहुत सतर्कता से निभाती हैं. यही देवी योगमाया ही श्रीकृष्ण के ही जन्म से पहले यशोदा के घर जन्मी थीं. यही देवी योगमाया विंध्यवासिनी कहलाती हैं. इसी देवी को कात्यायनी कहा गया है. क्योंकि देवी ने अपनी संतानों की रक्षा के लिए ही कात्यायन वंश में अवतार लिया था और असुरों का संहार किया था. यही कात्यायनी अंबा, दुर्गा और जगतमाता कहलाती हैं.
नवरात्र के छठे दिन इन्हीं देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है. छठी, सनातन परंपरा के 16 संस्कारों में भी शामिल है. छठी की रीत यानि कि शिशु के जन्म के छठवें दिन का खास समय. हालांकि कहीं-कहीं बालकों की छठी पांच दिनों में ही होती है, जिसे देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय से जोड़कर देखा जाता है. नवरात्र का पांचवा दिन स्कंदमाता का दिन है, जो भगवान कार्तिकेय की माता के स्वरूप में पार्वती ही हैं.
इसलिए पंचमी और षष्ठी दोनों ही तिथियां संतानों के जन्म और पालन-पोषण पर आधारित हैं.

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