
चापलूसी और निंदा पर चेतना की जीत... क्या है नवरात्रि की छठी देवी कात्यायनी का असली अर्थ
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नवरात्रि का छठा दिन देवी कात्यायनी की उपासना का होता है, जिन्हें आद्या शक्ति भी कहा जाता है. यह केवल देवी की आराधना का दिन नहीं, बल्कि उस ‘छठी इंद्री’ यानी विवेक को जागृत करने का प्रतीक है, जो हमें चापलूसी और निंदा जैसे आंतरिक शत्रुओं से मुक्त कर सच्चाई का बोध कराती है.
नवरात्रि की देवी परंपरा में छठवीं देवी का नाम कात्यायनी है. इन्हें आद्या कात्यायनी भी कहते हैं. हाथ में तलवार, धनुष-बाण और चक्र होने के बावजूद देवी की छवि सौम्य है. देवी को आद्या कहने का कारण ये है कि वह इस रूप में ही सबसे पहले प्रकट हुई थीं और फिर ज्योति स्वरूप में बदल गई थीं. दीपक की ज्योति भी उन्हीं का स्वरूप है. देवी आद्या कात्यायनी का ही सौम्य रूप योग माया का है . यही माया देवी सारे संसार का संचालन करती हैं.
देवी ने जिन दो असुरों का सबसे पहले वध किया था उनका नाम मधु-कैटभ था. असल में इन दोनों को मारा तो भगवान विष्णु ने था, लेकिन देवी माया के कारण ही भगवान विष्णु इन्हें मार पाए थे. मधु-कैटभ एक प्रतीक की तरह हैं. मधु का अर्थ है मीठी बातें और चापलूसी और कैटभ का अर्थ है निंदा.
देवी कात्यायनी छठवें नंबर की देवी हैं. यानी वह छठी इंद्री को भी कंट्रोल करती हैं. चापलूसी और निंदा को समझने के लिए छठी इंद्री सक्रिय होनी चाहिए. यह छठी इंद्री ही विवेक है, जो व्यक्ति को बाहरी शब्दों के प्रभाव से परे जाकर सत्य को पहचानने की क्षमता देती है. यह सक्रिय रहेगी, तभी हमारे भीतर का ब्रह्म, यानी विष्णु मधु-कैटभ यानी चापलूसी और निंदा की नेगिटिविटी को खत्म कर पाएगा. नवरात्र के छठवें दिन का यही अर्थ है.
चापलूसी और निंदा दो बहुत बड़े राक्षस हैं. यही दोनों हमें भ्रम के जाल में फंसाए रखते हैं. जब ये भ्रम का जाल टूटता है तभी हम कुछ क्रिएटिव कर पाएंगे. हम अपने आप में ब्रह्म हैं, लेकिन मधु-कैटभ हमारे भीतर रहने वाले ब्रह्म पर हमला कर देते हैं. यही मधु-कैटभ की कथा का सार है.
इसकी कहानी कुछ ऐसी है कि भगवान विष्णु के कान से मधु-कैटभ नाम के दो असुर जन्मे और उत्पात मचाने लगे. तभी उन्हें वाग्बीज ‘ऐं’ सुनाई दिया. सरस्वती के बीजमंत्र ‘ऐं’ का मधु-कैटभ लगातार जप करने लगे. एक हजार साल के कठोर तप के बाद माता पराशक्ति ने उनसे वर मांगने को कहा तो दोनों ने इच्छा मृत्यु मांग ली. शक्ति ने उनकी इच्छा के अनुसार वरदान दे दिया.

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