
'चीन प्लस वन' पॉलिसी से ड्रैगन का गेम बिगाड़ने में जुटे अमेरिका-यूरोप, इस रणनीति में भारत कितना अहम?
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पिछले 30 सालों से पश्चिमी कंपनियों का चीन के प्रति आकर्षण रहा है. सस्ते लेबर, कम लागत, कच्चे माल की उपलब्धता और चीन की पॉलिसीज की वजह से पश्चिमी देशों ने चीन में बेतहाशा निवेश किया. लेकिन अब चीन पर निर्भरता पश्चिमी देशों के लिए परेशानी का सबब बन चुकी है. ऐसे में पश्चिमी देश कई सालों से चीन के अलावा ऐसे देश की तलाश में जुटे हैं, जो मैन्यूफैक्चरिंग के मामले में चीन का विकल्प बनकर खड़ा हो. इसे ही चीन प्लस वन पॉलिसी कहते हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर रवाना हो गए हैं. पीएम मोदी का अमेरिका दौरे ऐसे वक्त पर हो रहा है, जब चीन से भारत और US दोनों के रिश्ते ठीक नहीं चल रहे हैं. जहां भारत से चीन का सीमा विवाद चल रहा है, तो वहीं ताइवान और साउथ चाइना सी को लेकर अमेरिका और चीन आमने सामने हैं. यही वजह है कि पीएम मोदी के अमेरिका दौरे से चीन को मिर्ची लगी है. चीनी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने तो ये तक कह दिया कि अमेरिका भारत के साथ साझेदारी का लाभ खुद को मजबूत करके उठाना चाहता है और दुनिया के मंच पर चीन की ग्रोथ को रोकना चाहता है.
पश्चिम और चीन के बीच बढ़ते तनाव के चलते अमेरिका और यूरोपीय देशों की नजर एशिया में चीन की जगह भारत को लाकर पावर बैलेंस करने पर है. अमेरिका भारत को चीन के प्रतिद्वंदी के तौर पर देखता है, यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के बीच में व्यापार काफी बढ़ गया है. वित्त वर्ष 2022-2023 में भारत और अमेरिका के बीच 10 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का व्यापार हुआ है.
अमेरिकी कंपनियों के CEO से मिलेंगे पीएम मोदी
पीएम मोदी इस दौरे पर एलन मस्क समेत कई अमेरिकी कंपनियों के CEOs से मिलेंगे. इस दौरान पीएम मोदी इन कंपनियों को भारत में निवेश का न्योता दे सकते हैं. यह कहीं न कहीं अमेरिका की 'चीन प्लस वन पॉलिसी' का ही हिस्सा होगा, क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय देश पिछले कुछ सालों से इसी कोशिश में लगे हैं कि उनके देश की कंपनियां चीन के अलावा अन्य देशों में विकल्प तलाश करें.
पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा का फुल कवरेज यहां देखें
क्या है 'चीन प्लस वन पॉलिसी' ?

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