
घाटी से लगती सीमाओं पर बसे गांव हुए वीरान, लोगों ने कहा -केंद्रीय सुरक्षा बल नहीं होते तो...
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मणिपुर के ज्यादातर इलाकों में भले ही स्थिति सामान्य नजर आती है लेकिन हिंसा और आगजनी की छिट पुट घटनाएं अभी भी हो रही हैं. शनिवार की शाम इंफाल में राज्य सचिवालय के ठीक पीछे एक घर में आग लग गई. यह घर कुकी समाज के एक व्यक्ति का है जिसने हिंसा के बाद घर छोड़ दिया था. वहीं 5 दिन पहले यानी 10 जून को मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की एडवांस सुरक्षा टीम पर कुकी उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला किया था. ऐसे में वहां के हालात का जायजा लेने आजतक की टीम ग्राउंड जीरो पर पहुंची.
मणिपुर में इंफाल घाटी के ज्यादातर इलाके अब सामान्य स्थिति की ओर लौट रहे हैं, लेकिन कुछ घटनाएं अभी भी हो रही हैं. पिछले साल शुरू हुई दो समुदायों के बीच हिंसा के 1 साल बीत जाने के बाद फिर से आजतक की टीम मणिपुर के ग्राउंड जीरो पर पहुंची है. घाटी के आगे उन इलाकों की स्थिति कैसी है जहां मैतेई समाज और कुकी समाज के लोग आमने-सामने रहते थे.
इंफाल से होते हुए थोबाल के रास्ते आज तक की टीम टेक्नोपोल पहुंची. टेग्नोपाल मणिपुर का पहाड़ी जिला है यहां कुकी समाज के रहने वाले नागरिकों की संख्या ज्यादा है. जहां से इस जिले की सीमा रेखा शुरू होती है. वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों ने एक किलोमीटर से भी लंबा बफर जोन तैयार कर दिया है. घाटी के पलेल इलाके में दोनों समाज के लोग बड़ी संख्या में साथ रहते थे, लेकिन हिंसा के बाद अब पलेल शहर दो भाग में बंट गया है.
दो हिस्सों में बंटा गांव असम राइफल्स ने एक लंबा बफर जोन बनाया है, जिसकी वजह से पहाड़ों में रहने वाले कुकी समाज के लोग ना तो घाटी में आ सकते हैं और ना ही घाटी में रहने वाले मैतेई समाज के लोग पहाड़ों की ओर जा सकते हैं. केंद्रीय सुरक्षा बलों की कोशिश है कि हथियार बंद लोग एक दूसरे के इलाकों मेंजाकर किसी घटना को अंजाम ना दे पाएं.
पुलिस तक यहां बंट चुकी है पलेल बफर जोन पार करने के बाद हम टेक्नोपाल जिले की सीमा में प्रवेश कर गए. राज्य में हुई समुदायों के बीच हिंसा का असर प्रशासन पर भी दिखाई देता है. मणिपुर पुलिस भी समुदाय में बंट कर रह गई है. पहचान छुपाने के तर्ज में कमरे पर आकर के कुकी समाज के एक मणिपुर पुलिस जवान ने बताया कि हालात कितने मुश्किल हैं. इस जवान ने बताया कि पुलिस भी बंट चुकी है और हिंसा के बाद में मैतेई पुलिसकर्मी इंफाल में हैं तो कुकी पुलिसकर्मी पहाड़ों में आ चुके हैं.
गांव छोड़ पहाड़ों पर जा कर रह रहे लोग टेक्नोपॉल में घाटी से लगने वाले में सीमावर्ती गांव में सन्नाटा पसर गया है. बच्चे बुजुर्ग महिलाएं गांव के गांव छोड़कर सुदूर पहाड़ी शहरों में बस गए हैं. आज भी अपनी रसद के लिए इंफाल घाटी की ओर सीधा रास्ता ना लेकर पहाड़ों से एक जिले से दूसरे जिलों का सफर करके मिजोरम तक जाते हैं. पीटर ने हमें बताया कि आज भी कुकी समाज के लोग में कुकी समाज के लोग मेतेई इलाकों में जाने से डरते हैं क्योंकि जान का खतरा है ऊपर से ज़रूरतें पूरा करने के लिए पहाड़ों में लंबा संघर्ष करना पड़ता है.
गांवों अबतक बंद हैं स्कूल कई कुकी गांव भी हिंसा में जला दिए गए थे. घाटी से लगते हुए टेक्नोपोल के जिस गांव में टीम पहुंची वहां कोई नहीं था. स्कूल बंद हैं. घरों के आगे ताले लगे हैं. गांव जंगल और झाड़ियां में तब्दील हो रहे हैं. हिंसा के बाद से ही कुकी समाज के लोग अपने लिए अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं. इसका मणिपुर के घाटी में रहने वाले लोग विरोध करते रहे. पहाड़ी इलाकों में घरों पर सेपरेट एडमिनिस्ट्रेशन लगभग हर दीवारों पर लिखा दिखाई देता है.सीमावर्ती गांव में अब कोई बचा नहीं है.

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