
क्यों छोड़ रहे हैं Gen Z अपनी नौकरी? जानें काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव
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भारत में Gen Z ने सफलता की नई डेफिनेशन सेट की है. पहले जहां काम और पद ज्यादा जरूरी होते थे, वहीं उनके लिए करियर से ज्यादा जरूरी है मानसिक शांति और जिंदगी में संतुलन. यह सोच पुराने करियर मॉडल को चुनौती दे रहा है और कंपनियों को अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर कर रहा है.
भारत में Gen Z ने सफलता के पैमाने बदल दिए हैं. पहले सफलता है मतलब होता था जल्दी आगे बढ़ना, अधिक पैसे कमाना और अच्छे पोस्ट पर खुद को देखना. लेकिन आज युवाओं की सोच बदल गई है. Gen Z कर्मचारी अब करियर की इस दौड़ से दूर हो रहे हैं. ऐसा इसलिए नहीं है कि वे मेहनत नहीं करना चाहते, बल्कि इसलिए कि उन्हें इसमें खुशी या फायदा नहीं दिखता. हाल में हुए वैश्विक सर्वे बताता है कि लगभग आधे युवा अब खुद को एंबिशियस नहीं मानते. उनका कहना है कि प्रमोशन या पोस्ट पाने से अधिक जरूरी उनके लिए मेंटल पीस, इमोशनल बैलेंस और एक स्थिर जीवन है.
एक और अन्य सर्व के मुताबिक, 47 प्रतिशत कर्मचारी अब कॉर्पोरेट सीढ़ी चढ़ने में रुचि नहीं रखते. वे पद या रैंक की जगह जीवन में संतुलन, अपनापन और खुश रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसका साफ मतलब है कि अब युवा सफलता को सिर्फ पद या पैसा नहीं बल्कि अच्छी जिंदगी, मानसिक स्वास्थ्य और संतुलन के हिसाब से देख रहे हैं.
मुझे नहीं करना है जॉब
बेंगलुरु में रहने वाले 24 साल के डेटा एनालिस्ट आरव कहते हैं कि अब मैं मैनेजर बनने का सपना नहीं देखता. मैंने अपने से बड़े पोस्ट पर बैठे लोगों को 30 साल की उम्र तक आते-आते थकते-हारते देखा है. अगर सफलता है मतलब हमेशा तनाव में रहना है, तो मुझे यह नहीं चाहिए.
सफलता की नई परिभाषा
बदलते समय के साथ सफलता की परिभाषा में भी कई बदलाव देखे जा रहे हैं. सर्वे में पता चला कि 52 प्रतिशत युवा अब करियर में तरक्की से ज्यादा मानसिक शांति और संतुलन चाहते हैं. 41% लोग कहते हैं कि वे निश्चित समय और मेंटल सुरक्षा पाने के लिए कम सैलरी पर भी काम कर सकते हैं. वहीं, पुराने मापदंड की बात करें तो, पद और लंबे काम के घंटे बहुत मायने रखते हैं. इसे लेकर दिल्ली की 26 साल की महक कहती हैं कि मैं अपनी जिंदगी आराम से जीना चाहती हूं. मैं अपना काम अच्छे से करती हूं, लेकिन काम मेरे पूरे जीवन पर हावी न हो.

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