
क्यूआर कोड की मदद से परिवार से मिला मानसिक रूप से दिव्यांग लड़का, खेलते-खेलते हो गया था लापता
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अपने घर के पास के खेलते वक्त लापता हुए मानसिक रूप से दिव्यांग लड़का अपने परिवार को मिल गया. पुलिस ने बताया कि लड़के के बारे में एक बस कंडक्टर ने डायल 100 पर बताया कि एक बच्चा है जो मानसिक रूप से दिव्यांग है और वह केवल अपना नाम बता पा रहा है. इसके बाद पुलिस की टीम ने क्यूआर स्कैनर की मदद से बच्चे के परिवार से संपर्क किया.
हम लोग हर रोज क्यूआर कोड के जरिए कई पेमेंट करते हैं, लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि ये क्यूआर कोड किसी की जान बचा सकता या किसी खोए हुए बच्चे को अपने घर वालों से मिल सकता है. ऐसा ही एक वाक्य सामने आया है, जहां क्यूआर कोड लॉकेट की मदद से एक मानसिक रूप से दिव्यांग लड़का सही सलामत अपने घर पहुंच गया.
दरअसल, वर्ली इलाके से 12 वर्षीय मानसिक रूप से दिव्यांग एक लड़का खेलते-खेलते बस में बैठकर लापता हो गया. इसके बाद कंडक्टर ने पुलिस से संपर्क किया. पुलिस ने क्यूआर कोड की मदद से बच्चे के माता-पिता से संपर्क किया.
इस बारे में जानकारी देते हुए कोलाबा थाना पुलिस ने बताया कि लड़के की पहचान विनायक कोली के रूप में हुई है जो अनजाने में एक स्थानीय बस में चढ़ गया था. लड़का वर्ली से लगभग 3 बजे लापता हुआ था और हमारी टीम ने उसे रात आठ बजकर 20 मिनट के आसपास देखा. वह संग्रहालय बस स्टॉप पर था.
कंडक्टर ने दी पुलिस को जानकारी
पुलिस ने बताया कि जिस बस में लड़का था. उसके कंडक्टर ने डायल 100 पर बताया एक बच्चा है जो मानसिक रूप से दिव्यांग है और वह केवल अपना नाम बता पा रहा है. इसके बाद हमारी टीम पुलिस स्टेशन ले आई और जब हमने उसके क्यूआर कोड बेस्ड लॉकेट को स्कैन किया तो हमें माता-पिता का पता मिला, जिसके बाद बच्चे के माता-पिता से संपर्क किया गया.
इस लॉकेट के बारे में बताते हुए डेटा इंजीनियर अक्षय रिडलान ने बताया कि ये लॉकेट लापता व्यक्तियों को खोजने और उन्हें उनके परिवारों के साथ सुरक्षित रूप से मिलाने के लिए लोगों को सुरक्षित रखने का नए इनोवेशन है. ये मुख्य रूप से खोए हुए लोगों को घर वापस भेजने में कारगर है. प्रोजेक्ट चेतना दिव्यांग बच्चों और डिमेंशिया या अल्जाइमर से पीड़ित बुजुर्गों के लिए एक एनजीओ की पहल है जो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर खोए हुए व्यक्ति की जानकारी साझा कर लोगों को अपने परिवार से मिलाता है.

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