
क्या शुरू हो चुका है दूसरा कोल्ड वॉर, रूस की जगह इस बार कौन सा देश देगा अमेरिका को टक्कर?
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रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच दुनिया अलग-अलग खांचों में बंट रही है. फिलहाल, जिस भी छोटे-बड़े देश को उठाकर देखें, टेंशन साफ दिखती है. इसे दूसरा कोल्ड वॉर भी कहा जा रहा है. पहले शीत युद्ध में दुश्मन और दोस्त अलग-अलग थे, लेकिन ये युद्ध ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि इसमें कई ताकतों का घालमेल है. कुछ ही देश हैं, जिनके पास तटस्थ रहने की छूट है.
कुछ रोज पहले मिलिट्री गठबंधन नाटो में स्वीडन और फिनलैंड भी शामिल हो गए. ये वे देश हैं, जो लंबे समय से जंग से दूरी बरतते रहे. इनको हरी झंडी मिलते ही रूस बौखला गया. असल में दोनों ही देशों की सीमाएं रूस से सटी हुई हैं और नाटो पर अमेरिका का दबदबा है. इन हालातों में रूस को लगातार डर बना हुआ है. वहीं अमेरिका भी खतरे से खाली नहीं.
ताकत के मामले में लगभग बराबर आ चुका चीन जब-तब अमेरिका को ललकारता है. कई और देश भी हैं, जो अपना अलग खेमा बना चुके. कुल मिलाकर देशों का हाल झगड़ालू पड़ोसियों जैसा हो चुका है, जो मौके का इंतजार कर रहे हैं. एक्सपर्ट इसे सेकंड या न्यू कोल्ड वॉर कह रहे हैं.
क्या था पहले शीत युद्ध का इतिहास रूस और अमेरिका दूसरे वर्ल्ड वॉर से पहले एक साथ आ तो गए थे, लेकिन तनाव बना हुआ था. लड़ाई खत्म होने के साथ ही अमेरिका ज्यादा ताकतवर दिखने लगा. रूस का सिंहासन हिलने लगा था. उसने खुद को आगे दिखाने के लिए कई जोड़भाग शुरू कर दिए. यहीं से दोनों देशों के बीच जो लड़ाई शुरू हुई तो दुनिया दो खांचों में बंट गई.
इसमें असली जंग नहीं हुई क्योंकि लगातार दो लड़ाइयों से दुनिया थक चुकी थी, इसकी बजाए देशों को अपने पाले में खींचने की लड़ाई होने लगी. इसी दौरान वियतनाम और कोरिया युद्ध हुआ, जिसमें दोनों तरफ से सैनिकों की जानें गईं. लगभग 40 सालों बाद कोल्ड वॉर खत्म हुआ. लेकिन इतने वक्त में देशों के बीच आपसी तनाव गहरा चुका था. यहां तक कि छोटे देश भी अनचाहे ही इस लड़ाई का हिस्सा बन चुके थे.
अब का माहौल भी कुछ वैसा ही है. फर्क ये है कि दुश्मन अब केवल रूस और अमेरिका नहीं, बल्कि खेल में कई और खिलाड़ी भी हैं. इसमें चीन का नाम टॉप पर है, जिसे सबसे ताकतवर और शातिर प्लेयर माना जा रहा है. जानिए, क्यों माना जा रहा है ऐसा - रूस की जीडीपी अमेरिका से काफी कम है, जबकि अगले एक दशक में चीन अमेरिका से आगे निकल जाएगा. ये बात खुद वॉशिंगटन मान रहा है. - तकनीक के मामले में रूस अमेरिका से पीछे ही रहा, जबकि चीन इसमें भी बाजी मारता दिख रहा है. - चीन की आबादी अमेरिका से लगभग चौगुनी है. ये भी एक तरह का पॉजिटिव है क्योंकि ये युवा आबादी है, जो काम कर सकेगी. - फिलहाल दुनिया के बहुत से देश चीन के कर्ज में डूबे हुए हैं. जंग की स्थिति में दबाव में सही, ये देश चाइना के साथ आ सकते हैं. - चीन के पास परमाणु ताकत भी है, जो उस समय नहीं थी. कई थिंक टैंक ये तक दावा करते हैं कि चीन की आर्मी इस वक्त दुनिया में सबसे ज्यादा शक्तिशाली है.

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लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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