
क्या न्यायपालिका 'सुपर संसद' की तरह काम कर रही है? धनखड़ के सवालों के मायने क्या?
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राष्ट्रपति की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और वक्फ कानून जैसे मामलों में उसका हस्तक्षेप कार्यपालिका-न्यायपालिका और विधायिका-न्यायपालिका के बीच एक किस्म के तनाव को उजागर करता है. भारत की शासन व्यवस्था में ऐसे तनाव और टकराव के मौके कम ही देखने को मिलते हैं. धनखड़ का बयान न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच सीमाएं तय करने की बहस को आगे बढ़ाता है.
ज्यूडिशियल ओवररीच, ज्यूडिशियल एक्टिविज्म पर गहरी क्षुब्धता जताते हुए भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार को विवादों का वो पैंडोरा बॉक्स खोल दिया है जिस पर भारतीय गणराज्य की लोकतांत्रिक बुनियाद टिकी हुई है. भारत का संविधान कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बंटवारा करता है. इन तीन अंगों के बीच नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) की व्यवस्था बनी है.
धनखड़ ने गुरुवार को विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियों और दायित्वों पर ऐसा रोषपूर्ण भाषण दिया कि सत्ता के गलियारों से लेकर न्यायपालिका की चैंबर्स तक में एक डिबेट शुरू हो गई. धनखड़ के भाषण का मुख्य तर्क यह है कि न्यायपालिका को अपनी संवैधानिक सीमाओं का पालन करना चाहिए और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए. हालांकि सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण यह है कि वह संवैधानिकता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है.
यह विवाद न केवल कानूनी, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत के लोकतंत्र की मजबूती और संतुलन पर सवाल उठाता है.
आइए सबसे पहले जगदीप धनखड़ के बयान का संदर्भ और उनके बयान के मायने को समझते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में एक ऐतिहासिक फैसला दिया था. इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि अगर राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर उस पर फैसला लेना होगा. अगर विधेयक की संवैधानिकता पर सवाल हो, तो राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 201 के अनुसार, जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो राष्ट्रपति को या तो उस पर सहमति देनी होती है या असहमति जतानी होती है. हालांकि, संविधान में इस प्रक्रिया के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है.

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