
कौन है तालिबान का वो नेता, जिसने डूरंड लाइन पर छुड़ा दिए पाकिस्तान के छक्के? जानें पूरी कहानी
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पाकिस्तान की सेना एक शख्स से खौफ खा रही है, उस शख्स का नाम है मोहम्मद फसीहुद्दीन फितरत, जो अफगानिस्तान के सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ हैं. जानिए उनके जीवन, तालिबान में भूमिका, पंजशीर पर कब्जा, बाल्खाब विद्रोह और ISIS-K के खिलाफ ऑपरेशन से जुड़ी पूरी कहानी.
Afghanistan Pakistan War: अफगानिस्तान ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. शुक्रवार की अल सुबह जब पाकिस्तान ने काबुल समेत अफगानिस्तान के दो प्रांतों पर हमला किया. तो अफगानिस्तान ने उसे करारा जवाब दिया और पाकिस्तान के 55 सैनिकों को सीमा पर मार गिराया. यही नहीं अब पाकिस्तान के शहरों को भी अफगानिस्तान निशाना बना रहा है. भले ही अफगानिस्तान की सैन्य ताकत पाकिस्तान से कम है, लेकिन उसने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए हैं. तालिबान सेना ने डूरंड लाइन के आसपास मौजूद पाकिस्तान सेना के दो बेस समेत 19 पोस्ट कब्जा लिए हैं. अफगानिस्तान की इस रणनीति के पीछे एक ही नाम सामने आ रहा है और वो हैं वहां के सैन्य प्रमुख फसीहुद्दीन फितरत.
कौन हैं मोहम्मद फसीहुद्दीन फितरत? वह अफगानिस्तान के एक प्रमुख राजनीतिक और सैन्य नेता हैं. साल 2021 से वे अफगान सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के पद पर तैनात हैं. वे तालिबान के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं. जातीय रूप से वे ताजिक समुदाय से आते हैं, जो अफगानिस्तान के उत्तरी हिस्से में बड़ी संख्या में रहता है. तालिबान के भीतर उनकी छवि एक रणनीतिक और सख्त कमांडर की रही है. 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद उनका कद और बढ़ गया. उन्हें उत्तर अफगानिस्तान में तालिबान की सैन्य सफलता का प्रमुख चेहरा माना जाता है.
बदख्शां से निकला एक ताजिक नेता फसीहुद्दीन फितरत का जन्म अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत के वारदुज ज़िले के इस्तिराब कस्बे में हुआ था. वे दरी भाषा बोलने वाले ताजिक समुदाय से संबंध रखते हैं. उनका पालन-पोषण एक सुन्नी मुस्लिम परिवार में हुआ. उनके पिता मौलवी सैफुद्दीन इस्लामी विद्वान थे और वारदुज में इमाम के रूप में सेवाएं देते थे. धार्मिक माहौल में पले-बढ़े फितरत पर बचपन से ही इस्लामी शिक्षा का गहरा प्रभाव रहा. यही पृष्ठभूमि आगे चलकर उनके जीवन की दिशा तय करने में अहम साबित हुई.
मदरसे में पढ़ाई और शिक्षक के रूप में शुरुआत फितरत ने 1990 के दशक में यमगान ज़िले के एक मदरसे से अपनी शिक्षा पूरी की. धार्मिक शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने उसी इलाके में एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम किया. इस दौर में वे स्थानीय स्तर पर एक शिक्षित और धार्मिक युवा के रूप में जाने जाते थे. हालांकि, देश में चल रहे गृहयुद्ध और राजनीतिक उथल-पुथल ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. कुछ समय बाद वे इस्लामी अध्ययन के लिए कराची भी गए. वहीं से उनका झुकाव पूरी तरह तालिबान आंदोलन की ओर हो गया.
तालिबान में शामिल होने का फैसला 1990 के दशक के आखिर में फसीहुद्दीन फितरत तालिबान में शामिल हो गए. उस समय तालिबान अफगानिस्तान में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था. 1996 में तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर अपनी इस्लामिक अमीरात की स्थापना की थी. फितरत ने उत्तरी इलाकों में नॉर्दर्न अलायंस के गढ़ों को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई. उनके प्रयासों से तालिबान को ताजिक बहुल क्षेत्रों में भी पैर जमाने में मदद मिली. इसी वजह से वे संगठन के भीतर तेजी से ऊपर बढ़ते गए.
2001 के बाद ‘शैडो गवर्नर’ की भूमिका साल 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाले हमले के बाद तालिबान की सरकार गिर गई. इसके बाद तालिबान ने अलग-अलग प्रांतों में ‘शैडो गवर्नर’ यानी समानांतर प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया. फितरत को बदख्शां का शैडो गवर्नर बनाया गया. 2013 में उन्हें आधिकारिक तौर पर बदख्शां में तालिबान की सैन्य आयोग का प्रमुख भी नियुक्त किया गया. उसी साल वे एक प्रचार वीडियो में पहली बार सार्वजनिक रूप से नजर आए. इस दौरान उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान की पकड़ मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई.

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