
कुलदीप सिंह सेंगर के मामले में Epstein Files का जिक्र, जानें सुप्रीम कोर्ट में 'इंसाफ' की जंग की पूरी कहानी
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एप्सटीन फाइल्स की गूंज के बीच सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडियन एप्सटीन’ कहे गए कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ा झटका दिया है. नाबालिग से रेप मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की जमानत पर SC ने रोक लगाते हुए पॉक्सो एक्ट और पब्लिक सर्वेंट की व्याख्या पर अहम टिप्पणी की. क्या है पूरी कहानी, पढ़ें यहां.
एक मरे हुए शख्स ने पूरी दुनिया के ना जाने कितने ही ताकतवर लोगों की जिंदगी में भूचाल ला दिया है. उस मुर्दे की एक फाइल के किसी पन्ने में ना जाने कब किसका नाम और किसके साथ उसकी तस्वीर आ जाए. बस यही सोचकर हर ताकतवर और नामचीन शख्स डरा हुआ है. बात डरने की है भी. क्योंकि दुनिया भर में बदनाम जिस एप्सटीन फाइल्स ने इस वक्त सुर्खियों में अपनी जगह बना रखी है, उस फाइल्स की कहानी ये है कि उसमें दुनिया के ना जाने कितने ही ताकतवर, अमीर, मशहूर, दानवीर लोगों को उस शख्स के करीब दिखाया गया है, जिस पर नाबालिग बच्चियों का यौन शोषण करने का इल्जाम था. सोमवार को उसी एप्सटीन फाइल्स का जिक्र अचानक देश की सबसे बड़ी अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट के परिसर में भी हुआ.
असल जानकारी के मुताबिक, सजायाफ्ता मुजरिम कुलदीप सिंह सेंगर शायद कभी अमेरिका नहीं गया. अब जाहिर है जब अमेरिका नहीं गया तो एप्सटीन से भी नहीं मिला होगा. अब जब उससे मिला ही नहीं तो इतना तो तय है कि नाबालिग बच्चियों के साथ एप्स्टीन वाली फाइल में कम से कम इसकी तस्वीर नहीं होगी. लेकिन अमेरिका और एप्सटीन से दूर 8 साल पहले 2017 में यूपी की सत्ता वाली सरकार का विधायक रहते हुए इसने एक नाबालिग बच्ची के साथ जो कुछ किया बस उसी की वजह से शायद सुप्रीम कोर्ट में सोमवार की दोपहर इसी कुलदीप सिंह सेंगर को इंडियन एप्सटीन गैंग का मेंबर या सरगना बताया गया.
पिछले पांच दिनों से दिल्ली हाईकोर्ट के जिस एक फैसले ने हर खास-ओ-आम को बेचैन करके रख दिया था, जिस एक सवाल ने हरेक को हैरान परेशान कर दिया था कि आखिर एक रेपिस्ट जिसे उम्रकैद की सजा मिली हुई है, उसे जमानत पर कोई कैसे रिहा करने का हुक्म सुना सकता है. शायद इस फैसले से खुद देश की सबसे बड़ी अदालत भी हैरान थी. इसलिए सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने मातहत कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए आखिरकार कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. यानि सेंगर फिलहाल जेल से आजाद नहीं होगा. कायदे से देखा जाए तो दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला ही अपने आप में इतना अजीब था कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को रेप की शिकार पीडिता या उसका परिवार अपनी जीत भी नहीं बता सकता.
दरअसल, 23 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने ये कहते हुए कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दे दी थी कि वो 7 साल 6 महीने जेल में काट चुका है और जिस पॉक्सो एक्ट के तहत उसे पब्लिक सर्वेंट मानते हुए निचली अदालत ने उम्र कैद की सजा दी थी, वो उस सजा की श्रेणी में आता ही नहीं है. क्योंकि सेंगर को जमानत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जज के मुताबिक सेंगर पब्लिक सर्वेंट कभी था ही नहीं.
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सीबीआई ने पॉक्सो एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट वाले इसी क्लॉज को पकड़कर सुप्रीम कोर्ट में सेंगर को जमानत देने के फैसले की मुखालफत की थी. सीबीआई की दलील थी कि 2017 में जब सेंगर ने पीड़िता के साथ बलात्कार किया था, तब वो सत्ताधारी पार्टी बीजेपी का विधायक था. और एक विधायक या फिर सांसद पब्लिक सर्वेंट ही होता है. ये बात दिल्ली हाईकोर्ट ने समझने में गलती कर दी.

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