
किस्सा: पाकिस्तान में पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर क्यों चढ़ाया गया था? जेल डायरी के पन्नों में दर्ज है कहानी
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कभी जुल्फीकार अली भुट्टो ने भी जनरल जिया-उल-हक को पाकिस्तान सेना का प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) नियुक्त किया था, सात वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरलों को नजरअंदाज करते हुए. भुट्टो ने जिया को इसलिए चुना क्योंकि वह उन्हें कम महत्वाकांक्षी और आज्ञाकारी मानते थे, लेकिन उनका आकलन कितना गलत था, ये सच्चाई कुछ ही दिनों में सामने आ गई.
'मिट्टी के तेल की खाली बोतलें लेकर एक दुकान से दूसरी दुकान भटकने वाले या पेट्रोल के लिए एक पंप से दूसरे पंप का चक्कर काटने वाले लोगों से यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि वे सरकारी दावों पर वाह वाह करेंगे.'
ये मजमून एक पूर्व प्रधानमंत्री के डायरी के पन्नों में लिखा हुआ है. कहानी 1977-78 की है. जब जेल में बंद एक मुल्क का लोकप्रिय नेता अपने ही चेले की धोखाधड़ी का शिकार हो गया था. अब वो जेल में बंद था और अनहोनी का इंतजार कर रहा था.
ये अनहोनी 4 अप्रैल 1979 को आई. जब एक पूर्व प्रधानमंत्री को उनके अपने ही मुल्क की अदालत के फैसले पर अमल करते हुए फांसी पर चढ़ा दिया गया. ये शख्स था पाकिस्तान की राजनीति का कद्दावर शख्स जुल्फीकार अली भुट्टो.
लेकिन पाकिस्तान की सत्ता में नेताओं और जनरलों का अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर चला जाना कोई नई बात नहीं है. वहां पर सत्ता के शीर्ष पर पहुंच चुके किरदारों का अप्रत्याशित अंत कोई नई बात नहीं है.
ऑपरेशन सिंदूर का हवाला देकर पाकिस्तान में शहबाज शरीफ और आर्मी आसिम मुनीर दोनों ने ही अपनी स्थिति मजबूत कर ली है. शहबाज शरीफ ने आसिम मुनीर को 'फील्ड मार्शल' का देकर मुल्क में सेना के साथ किसी भी तात्कालिक टकराव को टाल दिया है. लेकिन शहबाज शरीफ जुल्फीकार अली भुट्टो की कहानी जानकर भी उससे सबक नहीं लेने के मूड में है.
कभी जुल्फीकार अली भुट्टो ने भी जनरल जिया-उल-हक को पाकिस्तान सेना का प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) नियुक्त किया था, सात वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरलों को नजरअंदाज करते हुए.

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