
कागजी प्लान, सिर्फ ऐलान और धुआं-धुआं आसमान... दिल्ली-NCR को क्यों पॉल्यूशन से नहीं मिल पा रही मुक्ति?
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पिछले 24 घंटे में वायु प्रदूषण से हालात और बिगड़ गए हैं. गुरुवार सुबह 6 बजे जहांगीरपुरी इलाके में AQI 606 तक पहुंच गया, जो काफी खतरनाक श्रेणी में माना जाता है. यह कहा जा सकता है कि दिल्ली में अब सांस लेना मुश्किल हो गया है.
देश में मौसम करवट ले रहा है और दिल्ली-एनसीआर में दमघोंटू हवाएं बीमार करने लगी हैं. पूरा शहर फॉग और स्मॉग की चपेट में है. एयर पॉल्यूशन के बीच धुंध और कोहरे की चादर बिछने लगी है. सड़कों पर विजिबिलिटी शून्य रिकॉर्ड की जा रही है. ट्रैफिक सुस्त पड़ गया है और लंबी-लंबी लाइनें जाम के झाम में उलझाकर रखे हैं. प्रदूषण को लेकर हर साल कागजों पर प्लान उकेरे जाते हैं. कंट्रोल के नाम पर बड़े-बड़े ऐलान होते हैं और दिल्ली-NCR का आसमान पूरे 4 महीने तक धुआं-धुआं देखा जाता है. आखिर वो क्या वजहें हैं, जिसके कारण यहां लोगों को पॉल्यूशन से मुक्ति नहीं मिल पा रही है?
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पिछले 24 घंटे में वायु प्रदूषण से हालात और बिगड़ गए हैं. गुरुवार सुबह 6 बजे जहांगीरपुरी इलाके में AQI 606 तक पहुंच गया, जो काफी खतरनाक श्रेणी में माना जाता है. यह कहा जा सकता है कि दिल्ली में अब सांस लेना मुश्किल हो गया है. यहां 24 घंटे में 14 स्टेशन का औसत AQI गंभीर+ (450 से ऊपर) श्रेणी में है.
सर्दी से पहले चर्चा में आ जाते पराली और दिवाली
दिल्ली में वैसे तो लोगों को पूरे साल जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर होना पड़ता है, लेकिन नवंबर आते ही सभी को एहसास होने लगता है कि हालात कितने बदतर हो गए हैं. खासकर सर्दी की एंट्री से पहले यहां दिवाली और पराली चर्चा में आ जाती है. ये दोनों कई फैक्टर्स के साथ आते हैं और नवंबर में दिल्ली को गैस चैंबर बना देते हैं. हालांकि, दिल्ली में दिवाली के आसपास के एक सप्ताह के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के आंकड़ों से पता चलता है कि यहां पटाखों का कोई खास प्रभाव नहीं देखा गया है. यहां तक कि पराली जलाने से भी दिल्ली के प्रदूषण में उतना योगदान नहीं होता, जितना आमतौर पर माना जाता है.
दिल्ली स्थित पर्यावरण थिंक टैंक 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' (CSE) की एक नई स्टडी में कहा गया है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण में पराली जलाने की भूमिका सिर्फ 8 प्रतिशत है. चिंता की बात यह भी है कि कथित समाधान ही शहर की समस्या का हिस्सा बन गए हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी का आधा साल तो जहरीली हवा में सांस लेते हुए गुजर जाता है. यही वजह है कि इसके दीर्घकालिक समाधान की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है.
कागजी प्लान, धुआंधार ऐलान... लेकिन समस्या वर्षों पुरानी

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