
कभी अमेरिका में बर्गर बेचते थे, आज मार्क जकरबर्ग और सुंदर पिचाई से भी ज्यादा सैलरी लेते हैं... जानें- इस भारतवंशी की पूरी कहानी
AajTak
अमेरिकी कंपनी पॉलो ऑल्टो नेटवर्क के सीईओ और चेयरमैन निकेश अरोड़ा अमेरिका में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले दूसरे शख्स बन गए हैं. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले सीईओ की लिस्ट जारी की है. इसके मुताबिक, अरोड़ा को मार्क जकरबर्ग और सुंदर पिचाई से भी ज्यादा सैलरी मिलती है.
अमेरिका की सिलिकॉन वैली यानी वो जगह जहां दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के हेडक्वार्टर हैं. और इसी सिलिकॉन वैली में भारतवंशियों का अच्छा-खासा दबदबा रहा है. खास बात ये है कि कुछ बड़ी कंपनियों के बॉस भी भारतवंशी ही हैं.
ऐसी ही एक कंपनी है पॉलो ऑल्टो नेटवर्क, जिसके सीईओ और चेयरमैन हैं निकेश अरोड़ा. निकेश अरोड़ा अमेरिका में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले दूसरे शख्स हैं. उन्होंने सैलरी के मामले में मार्क जकरबर्ग को भी पछाड़ दिया है. मार्क जकरबर्ग और निकेश अरोड़ा की सैलरी में लगभग 18 गुना का अंतर है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने 2023 में सबसे ज्यादा सैलरी लेने वालों की एक लिस्ट जारी की है. इस लिस्ट में पहले नंबर पर ब्रॉडकॉम के सीईओ हॉक टैन हैं. मलेशियाई मूल के हॉक टैन की सैलरी 16.2 करोड़ डॉलर (लगभग 1,348 करोड़ रुपये) है. ये उनकी सालभर की सैलरी है. इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर भारतीय मूल के निकेश अरोड़ा हैं. 2023 में उन्होंने 15.14 करोड़ डॉलर (लगभग 1,260 करोड़ रुपये) की सैलरी ली थी.
अरोड़ा की कमाई गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग से कहीं ज्यादा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की लिस्ट के मुताबिक, सुंदर पिचाई ने पिछले साल 2.44 करोड़ डॉलर (करीब 200 करोड़ रुपये) और मार्क जकरबर्ग ने 88 लाख डॉलर (करीब 73 करोड़ रुपये) कमाए थे.
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया है कि 2023 में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले टॉप 500 सीईओ की इस लिस्ट में 17 भारतवंशी हैं.
अरबतियों की लिस्ट में शुमार हैं अरोड़ा

ग्रीनलैंड में आजादी की मांग दशकों से चल रही है. फिलहाल यह द्वीप देश डेनमार्क के अधीन अर्ध स्वायत्त तरीके से काम करता है. मतलब घरेलू मामलों को ग्रीनलैंडर्स देखते हैं, लेकिन फॉरेन पॉलिसी और रक्षा विभाग डेनमार्क सरकार के पास हैं. अब कयास लग रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद के बीच वहां अलगाववाद को और हवा मिलेगी.

स्विटजरलैंड के दावोस में चल रहे WEF की बैठक में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने ट्रंप को बताया कि अमेरिका जैसी शक्ति को क्यों कानून आधारित वर्ल्ड ऑर्डर का सम्मान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में बहुपक्षवाद के बिखरने का डर सता रहा है. मैक्रों ने कहा कि दुनिया में जोर जबरदस्ती के बजाय सम्मान और नियम-आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देने की जरूरत है.

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस भाषण ने उस धारणा को तोड़ दिया कि वेस्टर्न ऑर्डर निष्पक्ष और नियमों पर चलने वाली है. कार्नी ने साफ इशारा किया कि अमेरिका अब वैश्विक व्यवस्था को संभालने वाली नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ने वाली ताकत बन चुका है. ट्रंप के टैरिफ, धमकियों और दबाव की राजनीति के बीच मझोले देशों को उन्होंने सीधा संदेश दिया है- खुद को बदलो, नहीं तो बर्बाद हो जाओगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले से स्थापित वर्ल्ड ऑर्डर में हलचल ला दी. ट्रंप के शासन के गुजरे एक वर्ष वैश्किल उथल-पुथल के रहे. 'अमेरिका फर्स्ट' के उन्माद पर सवाल राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ का हंटर चलाकर कनाडा, मैक्सिको, चीन, भारत की अर्थव्यवस्था को परीक्षा में डाल दिया. जब तक इकोनॉमी संभल रही थी तब तक ट्रंप ने ईरान और वेनेजुएला में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर दुनिया को स्तब्ध कर दिया.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दावोस शिखर सम्मेलन में मंगलवार को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसके संकेत दिए. उन्होंने दावोस शिखर सम्मेलन में कहा कि कुछ लोग इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहते हैं, ऐसा समझौता जो 2 अरब लोगों का बाजार बनाएगा और वैश्विक GDP के करीब एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करेगा.








