
कफ सिरप से कैप्सूल तक… हर तीन घंटे में फेल हो रही एक दवा, आखिर सिस्टम में गड़बड़ी कहां है?
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मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में 20 बच्चों की जान लेने वाले कोल्ड्रिफ कफ सिरप ने भारत की दवा इंडस्ट्री पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं. सरकार ने दवा पर बैन लगाया, FIR दर्ज हुई और जांच शुरू हुई लेकिन ये कहानी नई नहीं है. पिछले एक दशक में हर साल तीन हजार से ज्यादा दवाएं क्वालिटी टेस्ट में फेल हो रही हैं. सवाल यही है दुनिया को दवाएं देने वाला भारत अपने ही लोगों को जहर क्यों पिला रहा है?
सिर्फ अगस्त भर में इंडिया में 94 दवाएं क्वालिटी स्टैंडर्ड की परीक्षा में फेल हो गईं. मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 20 बच्चे मारे गए, इनमें 85 पर्सेंट बच्चे पांच साल से कम के थे. उनके पेरेंट्स ने बच्चों को ये सोचकर दवा दी थी कि उन्हें खांसी में आराम मिले. लेकिन वो दवा बच्चों के लिए जहर बन गई. वो मासूम हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गए. ये दुखद घटना कोल्ड्रिफ कफ सिरप के कारण हुई.
इसके बाद राज्य प्रशासन जागा और लगातार छापेमारी और टेस्ट किए गए. जांच में पता चला कि इस सिरप में 48.6 प्रतिशत डाइएथिलीन ग्लाइकॉल था. ऐसा घातक औद्योगिक सॉल्वेंट जो एक्यूट किडनी फेल्योर का कारण बन सकता है. मध्य प्रदेश सरकार ने अब इस दवा पर बैन लगा दिया है और FIR दर्ज कराई है. वहीं केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने इसके तमिलनाडु स्थित निर्माता Sresan Pharma के खिलाफ क्रिमिनल केस शुरू किया है.
चिंताजनक ट्रेंड
देखा जाए तो कोई नई त्रासदी नहीं है. साल 2019 में जम्मू-कश्मीर में इसी तरह का सिरप कम से कम 12 बच्चों की मौत का कारण बना था और चार अन्य गंभीर रूप से विकलांग हो गए. भारत के बाहर भी गाम्बिया (2022), उज्बेकिस्तान और कैमरून (2023) में भारतीय निर्मित सिरपों के कारण कुल 141 बच्चों की मौत हुई. हर बार ऐसी त्रासदी के बाद भारतीय नियामक कड़े परीक्षण का वादा कर तो देते हैं, लेकिन होता क्या है. फिर नए हादसे होते हैं और सवाल वहीं का वहीं रहता है कि भारत की दवाओं की सुरक्षा कितनी है और ये समस्याए बार-बार क्यों होती हैं.
डेटा बताता है कि सैंपल टेस्टिंग बढ़ने के बावजूद सबस्टैंडर्ड और नकली दवाएं बाजार में लगातार आती हैं. अगस्त में 2024–25 के दौरान लगभग 1.2 लाख दवा सैंपल टेस्ट किए गए. साल 2014–15 में ये संख्या 74,199 थी यानी लगभग 57 प्रतिशत बढ़ोतरी. फिर भी 3,000 से अधिक दवाएं हर साल मूल गुणवत्ता परीक्षण में फेल होती हैं. सिर्फ 2024-25 में, 3104 सैंपल क्वालिटी ऑफ स्टैंडर्ड में फेल हो गए. इनमें से 245 को नकली या मिलावटी पाया गया. पिछले दशक में 32,000 से अधिक सैंपल टेस्ट फेल हुए और 2,500 से ज्यादा नकली या मिलावटी पाए गए. औसतन हर दिन आठ दवाएं गुणवत्ता परीक्षण में फेल होती हैं यानी लगभग हर तीन घंटे में एक.
अभियोगों (Prosecutions ) की संख्या भी बढ़ी है. ये संख्या साल 2014-15 में 152 से बढ़कर 2024-25 में 961 हो गई. इससे क्या होता है क्या ये बदलाव है. जी नहीं, ये सभी रिएक्शन हैं न कि सुधार. राज्यसभा में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जुलाई में माना कि भारत में नकली दवा की कानूनी परिभाषा ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट,1940 में मौजूद नहीं है.

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