
औरंगजेब समर्थक और राणा सांगा विरोधी के साथ खड़े होकर क्यों फंस गए हैं अखिलेश यादव?
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कभी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की रीढ़ हुआ करते थे राजपूत. अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में 11 राजपूतों का होना इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है. घोसी उपचुनाव में भी वहां के राजपूतों ने बीजेपी के बजाए सपा को वोट देना उचित समझा था. पर क्या राणा सांगा का अपमान राजपूत बर्दाश्त करेंगे?
पिछले कुछ दिनों समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगातार सेल्फ गोल कर रहे हैं. या तो वह ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं या उत्तर प्रदेश की जनता की नब्ज को अभी वो ठीक से समझ नहीं सके हैं. वरना पहले औरंगजेब और अब राणा सांगा के अपमान के मुद्दे पर जिस तरह का रुख उन्होंने अपनाया वो उनके जैसे कद्दावर नेता के लिए असंभव था.
राजधानी लखनऊ में रविवार को सपा मुखिया अखिलेश यादव ने राणा सांगा पर दिए राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन के विवादित बयान का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि यदि भाजपा नेता औरंगजेब पर चर्चा करने के लिए इतिहास को पलट सकते हैं, तो रामजीलाल सुमन ने भी इतिहास के एक पन्ने का जिक्र किया है. सांसद रामजी लाल सुमन ने 21 मार्च को राज्यसभा में बोलते हुए राणा सांगा को 'गद्दार' करार दिया था. तब से राजनीतिक पार्टियों के बीच इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ गई है. समाजवादी पार्टी जहां अपनी मुस्लिम और दलित -पिछड़ा समर्थक बनाए रखना चाहती है वहीं बीजेपी समाजवादी पार्टी की छद्म धर्मनिरपेक्षता को बेनकाब करने के लिए दिन रात एक किए हुए है. भाजपा ने अखिलेश को निशाने पर लेते हुए कहा कि यह पूरे हिंदू समुदाय का अपमान है.
स्वामी प्रसाद मौर्य की तरह डैमेज करेंगे सुमन
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़ी राजीनीति के एक अहम प्यादे रहे हैं स्वामी प्रसाद मौर्य.बीएसपी की राजनीति करते हुए चर्चा में आए स्वामी प्रसाद वाया बीजेपी होते हुए समाजवादी पार्टी में पहुंचे थे. समाजवादी पार्टी में रहते हुए इन्होंने सवर्ण हिंदुओं और हिंदू देवी देवताओं पर ऐसी टिप्पणियां की थीं कि किसी दूसरे धर्म के रहे होते तो लिंचिंग हो गई होती. स्वामी प्रसाद हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते रहे और उनकी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव उन्हें शह देते रहे. जाहिर है कि अखिलेश को लगता था कि पिछड़ों और मुसलमानों को साधे रखने के लिए स्वामी प्रसाद जो कर रहे हैं उस पर रोक लगाना ठीक नहीं होगा. पर बाद में स्थितियां और खराब हो गईं और अखिलेश को स्वामी प्रसाद से छुटकारा पाना पड़ा.
2024 के लोकसभा चुनावों में अखिलेश को मिली सफलता बताती है कि स्वामी प्रसाद को किनारे करने का फैसला सही साबित हुआ.हो सकता है कि अखिलेश स्वामी प्रसाद को और पहले बाहर का रास्ता दिखाये होते तो बीजेपी को और नुकसान पहुंचाने में सफल हुए होते. पर शायद अखिलेश न तब समझे न अब समझ रहे हैं. पहले औरंगजेब पर अबू आजमी को समर्थन और अब राणा सांगा को देशद्रोही बताने वाले सांसद रामजी लाल सुमन की बातों का खंडन न करके उन्होंने जानबूझकर मुसीबत मोल ली है. आने वालों दिनों में एक बार फिर अखिलेश यादव को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.
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