
एयरक्राफ्ट से कैसे होती है क्लाउड सीडिंग... पढ़ लीजिए हर सवाल का जवाब
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क्लाउड सीडिंग बारिश कराने ऐसी तकनीक है जो बादलों में रसायन डालकर कृत्रिम वर्षा पैदा करती है. मुख्य तकनीकें- स्टेटिक और हाइग्रोस्कोपिक सीडिंग है. रसायन- सिल्वर आयोडाइड और नमक हैं. फायदे- सूखा कम हो जाता है. हवा साफ हो जाती है. सफलता दर 10-30% जितनी ही है. यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने का हथियार है.
क्लाउड सीडिंग एक ऐसी वैज्ञानिक विधि है जो बादलों में रसायन डालकर कृत्रिम बारिश पैदा करती है. यह सूखे, प्रदूषण या पानी की कमी को दूर करने में मदद करती है. नीचे 10 सरल बिंदुओं में पूरी जानकारी दी गई है. हर सवाल का जवाब...
क्लाउड सीडिंग बादलों को 'बीज' देने जैसी प्रक्रिया है. इसमें हवाई जहाज या मशीनों से बादलों में छोटे कण डाले जाते हैं, जो पानी की बूंदें या बर्फ के टुकड़े बनाते हैं. इससे बारिश तेज हो जाती है. यह मौसम को बदलने की एक सुरक्षित तकनीक है.
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खर्च जगह, तरीके और आकार पर निर्भर करता है. एक छोटे प्रोजेक्ट में लगभग 12.5 लाख से 41 लाख रुपये लग सकते हैं. बड़े प्रोजेक्ट में सालाना 8-12 करोड़ रुपये खर्च होता है. फायदा ज्यादा, जैसे अमेरिका में 20-40 मिलियन डॉलर का लाभ मिलता है.
दो मुख्य तकनीकें हैं: 'स्टेटिक सीडिंग' - ठंडे बादलों में बर्फ क्रिस्टल बनाना और 'हाइग्रोस्कोपिक सीडिंग' - गर्म बादलों में नमक से बड़ी बूंदें बनाना. भारत में हवाई जहाज, रॉकेट या जमीन की मशीनों से रसायन छिड़के जाते हैं. दिल्ली ट्रायल में 90 मिनट की फ्लाइट से काम हो जाएगा.

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