
ईरान और इजरायल की दोस्ती कैसे दुश्मनी में बदली? कभी तेल और हथियार होते थे सप्लाई, अब जंग के मुहाने पर दोनों देश
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1991 में गल्फ वॉर की समाप्ति ने ईरान और इज़रायल के बीच खुली दुश्मनी के युग की शुरुआत की. सोवियत संघ के पतन और एकमात्र महाशक्ति के रूप में अमेरिका के उदय ने इस क्षेत्र को और अधिक पोलराइज्ड कर दिया. वहीं, ईरान और इज़रायल ने खुद को लगभग हर प्रमुख जियो-पॉलिटिकल विमर्श में एक दूसरे के खिलाफ पाया. 1980 के दशक में शुरू हुआ ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 1990 के दशक से विवाद का केंद्र बन गया.
ईरान और इजरायल एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं जो कि अब जंग के मुहाने पर खड़े हैं. इसकी वजह है ईरान का इजरायल पर 180 से ज्यादा मिसाइल अटैक, ये हमला पिछले मंगलवार की रात को हुआ था, जब इजरायल के आसमान में ईरानी मिसाइलों की भारी बौछार देखी गई. हालांकि ये कोई रहस्य नहीं है कि ईरान-इजरायल का कट्टर दुश्मन है, लेकिन कई लोगों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि कभी ऐसा भी समय था जब दोनों देशों के बीच बहुत करीबी संबंध थे. लेकिन आज हालात पूरी तरह से अलहदा हैं.
ईरान और इजरायल के बीच संबंध कैसे खराब हुए, इसे समझने के लिए ईरान-इजरायल संबंधों के इतिहास को खंगालना जरूरी है, ताकि ये पता लग सके कि दोस्ती आखिर दुश्मनी में कैसे बदल गई.
1948 से पहले तक इजरायल था ही नहीं. ये पूरा फिलिस्तीन ही था, जिसपर कभी ऑटोमन साम्राज्य का राज था. 14 मई 1948 को इजरायल अस्तित्व में आया. संयुक्त राष्ट्र ने 1947 में फिलिस्तीन के बंटवारे का एक प्रस्ताव रखा. ये प्रस्ताव फिलिस्तीन को यहूदी और अरब राज्यों में बांटने का था. जबकि, येरूशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाने का प्रस्ताव रखा गया था. यहूदी नेताओं ने इस प्रस्ताव को मान लिया, लेकिन अरब नेताओं को ये मंजूर नहीं थी. ईरान उन 13 देशों में शामिल था, जिन्होंने इसके खिलाफ़ मतदान किया था. ईरान ने अपने रुख को 1949 में फिर से दोहराया, जब ईरान ने संयुक्त राष्ट्र में सदस्य के रूप में इज़रायल के प्रवेश के खिलाफ़ मतदान किया.
शुरुआती विरोध के बावजूद जियोपॉलिटिकल और रणनीतिक हितों ने जल्द ही ईरान और इज़रायल के बीच एक सीक्रेट संबंध को जन्म दिया. हालाकि सार्वजनिक रूप से ईरान ने इज़रायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया. लेकिन साल 1950 आते-आते ईरान, तुर्की के बाद इज़रायल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम-बहुल देश बन गया.
शाह शासन के वक्त दोस्त थे ईरान-इज़राइल
1953 में तख्तापलट के बाद ईरान में शाह के शासन की वापसी हुई. इसने ईरान-इज़रायल संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया. मोहम्मद रजा शाह पहलवी की सत्ता में वापसी के साथ ईरान और इज़रायल ने एक घनिष्ठ और बहुआयामी गठबंधन बनाना शुरू कर दिया. ईरान ने आधिकारिक तौर पर 1950 में इजरायल को मान्यता दी थी, उस समय ईरान में पश्चिम एशिया में सबसे बड़ी यहूदी आबादी रहती थी. शाह पहलवी शासन ने इजरायल को एक सहयोगी के रूप में देखा. पारस्परिक लाभ से प्रेरित इस दोस्ती ने ईरान और इजरायल के बीच आर्थिक, सैन्य और खुफिया सहयोग को बढ़ावा दिया. उन्होंने कम्युनिस्ट USSR को पश्चिम एशिया से बाहर रखने के साझा हितों के आधार पर एक करीबी रिश्ता भी डवलप किया, क्योंकि दोनों पूंजीवादी अमेरिका द्वारा समर्थित थे. तत्कालीन इजरायली प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन के नेतृत्व में ईरान को एक दोस्ताना जगह मिली. सऊदी अरब के दैनिक अरब न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक नवगठित यहूदी देश इजरायल ने अपने तेल का 40% ईरान से हासिल किया और इसके बदले में हथियारों, तकनीकी और एग्रीकल्चर से जुड़ी चीजों का व्यापार किया.

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